श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 4: सती द्वारा शरीर-त्याग  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  4.4.12 
दोषान् परेषां हि गुणेषु साधवो
गृह्णन्ति केचिन्न भवाद‍ृशो द्विज ।
गुणांश्च फल्गून् बहुलीकरिष्णवो
महत्तमास्तेष्वविदद्भवानघम् ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
दोषान्—दोष; परेषाम्—अन्यों के; हि—क्योंकि; गुणेषु—गुणों में; साधव:—साधुजन; गृह्णन्ति—पाते हैं; केचित्—कुछ; न—नहीं; भवादृश:—आपके समान; द्विज—हे द्विज; गुणान्—गुण; च—तथा; फल्गून्—छोटा; बहुली-करिष्णव:— अत्यधिक बढ़ा-चढ़ा देता है; महत्-तमा:—महापुरुष; तेषु—उनमें से; अविदत्—ढूँढते हैं; भवान्—आप; अघम्—दोष, त्रुटि ।.
 
अनुवाद
 
 हे द्विज दक्ष, आप जैसा व्यक्ति ही अन्यों के गुणों में दोष ढूँढ सकता है। किन्तु शिव अन्यों के गुणों में कोई दोष नहीं निकालते, विपरीत इसके यदि किसी में थोड़ा भी गुण होता है, तो वे उसे और भी अधिक बढ़ा देते हैं। दुर्भाग्यवश आपने ऐसे महापुरुष पर दोषारोपण किया है।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर दक्ष को उसकी पुत्री सती ने द्विज कह कर सम्बोधित किया है। द्विज मनुष्यों की सर्वश्रेष्ठ जातियों—ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य का सूचक है। दूसरे शब्दों में, द्विज सामान्य व्यक्ति न होकर ऐसा व्यक्ति होता है, जिसने गुरु से वैदिक साहित्य का अध्ययन किया है और जिसे अच्छे तथा बुरे का विवेक है। अत: यह आशा की जाती है कि वह तर्कशास्त्र तथा दर्शन को समझता है। दक्षकन्या सती ने दक्ष के समक्ष प्रबल तर्क प्रस्तुत किया। कुछ ऐसे महापुरुष हैं, जो अन्यों के गुणों को ही ग्रहण करते हैं। जिस प्रकार मधुमक्खी को पुष्पों के मधु से वास्ता रहता है, उनके काँटों तथा रंगों से नहीं, उसी प्रकार अत्यधिक योग्य व्यक्ति, जो विरले ही होते हैं, अन्यों के गुणों को ही ग्रहण करते हैं, उनके दोषों पर विचार नहीं करते, किन्तु सामान्य मनुष्य गुण तथा दोषों का निर्णय कर सकता है।

असाधारण महापुरुषों में भी श्रेणियाँ होती हैं और सर्वश्रेष्ठ मनुष्य तो वह है, जो किसी की नगण्य विशेषता को मानकर उस गुण को प्रवर्धित कर देता है। भगवान् शिव आशुतोष भी कहलाते हैं, क्योंकि वे तुरन्त प्रसन्न हो जाते हैं और किसी को भी बड़े से बड़ा वरदान दे देते हैं। उदाहरणार्थ, एक बार एक भक्त ने शिवजी से यह वर माँगा कि वह जिस किसी के सिर का स्पर्श करे, उस व्यक्ति का सिर धड़ से अलग हो जाये। शिवजी ने हामी भर दी। यद्यपि भक्त द्वारा माँगा गया वर प्रशंसनीय नहीं था, क्योंकि वह अपने शत्रु को मारना चाहता था, किन्तु भगवान् शिव ने भक्त की पूजा तथा अर्चना को ही उसका गुण समझ कर उसे वर दे दिया। इस प्रकार शिव ने उसके दुर्गुण को गुण मान लिया। किन्तु सती ने अपने पिता को दोषी ठहराते हुए कहा, “आप बिल्कुल इसके विपरीत हैं। यद्यपि शिव में अनेक गुण हैं और उनमें एक भी दोष नहीं है, किन्तु आपने उन्हें निकृष्ट मानकर उनके दोषों को ढूँढ निकाला है। उनके गुणों को दोष मानने के कारण आप महान् आत्मा न बन कर अत्यन्त पतित बन गये हैं। मनुष्य तभी महान् बनता है जब वह दूसरे के गुणों को स्वीकार करता है, किन्तु आपने वृथा ही अन्यों के गुणों को बुरा समझ कर अपने को सर्वाधिक पतित बना लिया है।”

 
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