श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 4: सती द्वारा शरीर-त्याग  »  श्लोक 16

 
श्लोक
किं वा शिवाख्यमशिवं न विदुस्त्वदन्ये
ब्रह्मादयस्तमवकीर्य जटा: श्मशाने ।
तन्माल्यभस्मनृकपाल्यवसत्पिशाचै-
र्ये मूर्धभिर्दधति तच्चरणावसृष्टम् ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
किम् वा—अथवा; शिव-आख्यम्—शिव कहलाने वाले; अशिवम्—अशुभ, अमंगल; न विदु:—नहीं जानते; त्वत् अन्ये— आपके अतिरिक्त, अन्य; ब्रह्म-आदय:—ब्रह्मा इत्यादि; तम्—उनको (शिव को); अवकीर्य—बिखेरे हुए; जटा:—जटा बनाये; श्मशाने—श्मशान में; तत्-माल्य-भस्म-नृ-कपाली—जो नर-मुंडों की माला पहने और राख लगाये हुए हैं; अवसत्—संग रहने वाले; पिशाचै:—असुरों के साथ; ये—जो; मूर्धभि:—शिर से; दधति—धारण करते हैं; तत्-चरण-अवसृष्टम्—उनके चरणकमल से गिरी हुई ।.
 
अनुवाद
 
 क्या आप यह सोचते हैं कि आपसे भी बढक़र सम्माननीय व्यक्ति जैसे भगवान् ब्रह्मा, इस शिव नाम से विख्यात अमंगल व्यक्ति को नहीं जानते? वे श्मशान में असुरों के साथ रहते हैं, उनकी जटाएँ शरीर के ऊपर बिखरी रहती हैं, वे नरमुंडों की माला धारण करते हैं और श्मशान की राख शरीर में लपेटे रहते हैं, किन्तु इन अशुभ गुणों के होते हुए भी ब्रह्मा जैसे महापुरुष उनके चरणों पर चढ़ाये गये फूलों को आदरपूर्वक अपने मस्तकों पर धारण करके उनका सम्मान करते हैं।
 
तात्पर्य
 शिव जैसे महापुरुष की भर्त्सना करना निरर्थक है और ऐसा उनकी पत्नी सती द्वारा कहा जा रहा है, जिससे उनकी श्रेष्ठता सिद्ध हो सके। पहले उन्होंने कहा, “आप शिव को अशुभ कहते हैं, क्योंकि वे श्मशान में असुरों के साथ रहते हैं, अपने शरीर में मृतकों की राख लगाते हैं और नरमुंडों की माला से अपने को सज्जित करते हैं। आपने उनके अनेक दोष बताये हैं; किन्तु आप नहीं जानते कि उनकी स्थिति सदैव दिव्य है। यद्यपि वे अशुभ प्रतीत होते हैं, तो फिर ब्रह्मा जैसे महापुरुष उनके चरणकमलों की धूलि को अपने मस्तकों पर धारण करके उनका सम्मान क्यों करते हैं जिनकी आप निन्दा करते हैं?” चूँकि सती साध्वी स्त्री थीं और शिव की पत्नी थीं, अत: यह उनका कर्तव्य था कि वे शिव के उच्च पद को न केवल भावनाओं से वरन् तथ्यों के आधार पर स्थापित करें। शिव कोई सामान्य जीवात्मा नहीं हैं। यही शास्त्रों का मत है। वे न तो भगवान् के स्तर पर हैं और न सामान्य जीवात्माओं के स्तर पर। ब्रह्मा प्राय: सभी प्रकार से सामान्य जीवात्मा हैं। कभी-कभी जब कोई सामान्य जीवात्मा उपलब्ध नहीं होता तो ब्रह्मा का पद विष्णु के किसी विस्तार (अंश) द्वारा ग्रहण किया जाता है, किन्तु साधारणत: यह पद इस ब्रह्माण्ड की सबसे पवित्र जीवात्मा द्वारा ग्रहण किया जाता है। इस प्रकार शिव का पद वैधानिक रूप में ब्रह्मा से सदैव उँचा रहता है, यद्यपि शिवजी ब्रह्मा के पुत्र रूप में उत्पन्न हुए हैं। यहाँ इसका उल्लेख है कि ब्रह्मा जैसे पुरुष भी शिव के चरणकमलों की तथाकथित अशुभ धूल तथा फूलों को स्वीकार करते हैं। ब्रह्मा के वंशज नौ महर्षियों में से मरीचि, अत्रि, भृगु इत्यादि भी शिव का इसीप्रकार आदर करते हैं, क्योंकि उन्हें ज्ञात है कि शिवजी कोई सामान्य जीवात्मा नहीं हैं।
अनेक पुराणों में कभी-कभी इसकी पुष्टि की जाती है कि कोई-कोई देवता इतना ऊपर उठ जाता है कि वह लगभग भगवान् के पद तक पहुँच जाता है, किन्तु प्रत्येक धर्मग्रन्थ में इसकी पुष्टि हुई है कि भगवान् विष्णु ही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् (परमेश्वर) हैं। ब्रह्म संहिता में शिव को दही या मट्ठा जैसा कहा गया है। दही दूध से भिन्न नहीं, क्योंकि दूध से ही दही बनता है, अत: एक अर्थ में दही दूध ही है। इसी प्रकार शिव भी एक प्रकार से श्रीभगवान् हैं, किन्तु दूसरे विचार से वे ऐसे नहीं हैं, क्योंकि जैसे दही दूध होते हुए भी हमें दूध तथा दही में भेद करना पड़ता है। ये विवरण वैदिक साहित्य में उपलब्ध हैं। जब भी हम किसी देवता को भगवान् से अधिक उच्च पद पर आसीन पाते हैं, तो उसका उद्देश्य उस देवता विशेष के प्रति भक्तों का ध्यान आकर्षित करना होता है। भगवद्गीता (९.२५) में यह भी कहा गया है यदि कोई किसी विशेष देवता को पूजना चाहता है, तो सबों के हृदय में आसीन भगवान् उस देवता के प्रति अधिकाधिक आसक्ति उत्पन्न करते हैं, जिससे वह व्यक्ति उस देवता के धाम को पहुँच सके। यान्ति देवव्रता देवान्। देवताओं की पूजा द्वारा मनुष्य देवताओं के धाम को प्राप्त हो सकता है, इस प्रकार भगवान् की पूजा द्वारा वह दिव्य लोक को जा सकता है। वैदिक साहित्य में इसका स्थान-स्थान पर उल्लेख है। यहाँ पर सती द्वारा शिव की प्रशंसा कुछ तो पति होने से उनके प्रति व्यक्तिगत आदर के कारण और कुछ उनकी पूज्य स्थिति के कारण है, जो सामान्य जीवात्माओं, यहाँ तक कि ब्रह्मा से भी, बढक़र है।

जब शिव के पद को ब्रह्मा मानते हैं, तो सती के पिता दक्ष को भी यह मानना चाहिए था। सती के कथन का यही तात्पर्य था। वे वास्तव में अपने पिता के घर उत्सव में सम्मिलित होने नहीं आई थीं, यद्यपि आने के पूर्व उन्होंने अपने पति से यही तर्क दियी था कि वे अपनी बहनों तथा माता से भेंट करना चाहती थीं। यह तो कोरी दलील थी, क्योंकि अपने अन्त:करण में उन्होंने यह भाव बना रखा था कि वे अपने पिता दक्ष को आश्वस्त करेंगी कि शिव से विरोध बनाए रखना वृथा है। यही उनका मुख्य उद्देश्य था। किन्तु जब वे अपने पिता को समझा पाने में असमर्थ हो गई तो उन्होंने पिता द्वारा प्रदत्त शरीर को त्याग दिया, जैसाकि अगले श्लोकों में को मिलेगा।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥