श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 4: सती द्वारा शरीर-त्याग  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक
कर्णौ पिधाय निरयाद्यदकल्प ईशे
धर्मावितर्यसृणिभिर्नृभिरस्यमाने ।
छिन्द्यात्प्रसह्य रुशतीमसतीं प्रभुश्चे-
ज्जिह्वामसूनपि ततो विसृजेत्स धर्म: ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
कर्णौ—दोनों कान; पिधाय—बन्द करके; निरयात्—चले जाना चाहिए; यत्—यदि; अकल्प:—असमर्थ; ईशे—स्वामी; धर्म- अवितरि—धर्म का नियंत्रक; असृणिभि:—निरंकुश; नृभि:—व्यक्ति; अस्यमाने—कलंकित होकर; छिन्द्यात्—काट देना चाहिए; प्रसह्य—बलपूर्वक; रुशतीम्—निन्दा करने वाली; असतीम्—निन्दक की; प्रभु:—समर्थ; चेत्—यदि; जिह्वाम्—जीभ; असून्—(अपना) जीवन; अपि—निश्चय ही; तत:—तब; विसृजेत्—त्याग देना चाहिए; स:—वह; धर्म:—विधि है ।.
 
अनुवाद
 
 सती ने आगे कहा : यदि कोई किसी निरंकुश व्यक्ति को धर्म के स्वामी तथा नियंत्रक की निन्दा करते सुने और यदि वह उसे दण्ड देने में समर्थ नहीं है, तो उसे चाहिए कि कान मूँद कर वहाँ से चला जाय। किन्तु यदि वह मारने में सक्षम है, तो उसे चाहिए कि वह बलपूर्वक निन्दक की जीभ काट ले और अपराधी का वध कर दे। तत्पश्चात् वह अपने भी प्राण त्याग दे।
 
तात्पर्य
 सती ने जो तर्क दिया वह यह है कि जो मनुष्य किसी महान् पुरुष की निन्दा करता है, वह अधम है। किन्तु उसी तर्क से दक्ष यह कहकर सफाई दे सकता था कि प्रजापति होने के कारण उसका पद इतना सम्माननीय था कि सती निन्दा करने के बजाय उसके गुणों को स्वीकार कर सकती थी। किन्तु इस तर्क का उत्तर यह है कि सती निन्दा नहीं कर रही थी, वह तो सफाई दे रही थी। यदि सम्भव होता तो वह दक्ष की जीभ काट लेती, क्योंकि उसने शिव की निन्दा की थी। दूसरे शब्दों में, चूँकि शिव धर्म के रक्षक हैं, अत: जो कोई भी उनकी निन्दा करता है, उसका तुरन्त वध कर दिया जाना चाहिए और ऐसे व्यक्ति को मारने के बाद स्वयं अपने प्राण दे देने चाहिए। यही विधान है। किन्तु दक्ष सती का पिता था, इसलिए सती ने उसे मारने की अपेक्षा अपने प्राण दे देना उचित समझा। इससे उस पाप से मुक्ति मिल जाएगी, जो उसने शंकर का अपमान सुनकर किया था। श्रीमद्भागवत में यह शिक्षा दी गई है कि किसी भी दशा में उस व्यक्ति की हरकतों को, जो किसी महापुरुष का अपमान करता है, सहन नहीं करना चाहिए। यदि कोई ब्राह्मण हो तो उसे चाहिए कि वह अपना शरीर न त्यागे, क्योंकि ऐसा करने से उसे ब्राह्मण-वध का पाप चढ़ेगा, अत: ब्राह्मण को चाहिए कि वह उस स्थान को छोडक़र चला जाये या फिर अपने कान बन्द कर ले जिससे वह अपमान की बातें न सुन सके। यदि वह क्षत्रिय है, तो उसमें इतनी शक्ति होती है कि वह किसी भी व्यक्ति को दंड दे सके, अत: क्षत्रिय को चाहिए कि निन्दक की जीभ तुरन्त काट कर उसका वध कर दे। किन्तु जहाँ तक वैश्यों तथा शूद्रों का प्रश्न है, उन्हें चाहिए कि वे तुरन्त अपने प्राण दे दें। सती ने अपना शरीर त्यागने का संकल्प किया, क्योंकि उसने अपने को शूद्रों तथा वैश्यों में से एक समझा। जैसाकि भगवद्गीता (९.३२) में कहा गया है स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रा:। स्त्रियाँ, श्रमिक तथा वणिक वर्ग एक ही स्तर के हैं। चूँकि यह संस्तुति की गई है कि शिव जैसे किसी महापुरुष की निन्दा सुनने पर शूद्रों तथा वैश्यों को अपने प्राण दे देने चाहिए, अत: सती ने अपने प्राण देने का निश्चय किया।
 
शेयर करें
       
 
  All glories to Srila Prabhupada. All glories to वैष्णव भक्त-वृंद
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥