श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 4: सती द्वारा शरीर-त्याग  »  श्लोक 2

 
श्लोक
सुहृद्दिद‍ृक्षाप्रतिघातदुर्मना:
स्‍नेहाद्रुदत्यश्रुकलातिविह्वला ।
भवं भवान्यप्रतिपूरुषं रुषा
प्रधक्ष्यतीवैक्षत जातवेपथु: ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
सुहृत्-दिदृक्षा—अपने सम्बन्धियों को देखने की इच्छा की; प्रतिघात—बाधा; दुर्मना:—अनमनी होकर; स्नेहात्—स्नेहवश; रुदती—रोती हुई; अश्रु-कला—आँसुओं की बूँदों से; अतिविह्वला—अत्यधिक व्याकुल; भवम्—शिव; भवानी—सती; अप्रति-पूरुषम्—अद्वितीय; रुषा—क्रोध से; प्रधक्ष्यती—भस्म करने; इव—मानो; ऐक्षत—देखा; जात-वेपथु:—हिलती हुई, थर-थर काँपती हुई ।.
 
अनुवाद
 
 इस तरह अपने पिता के घर जाकर अपने सम्बन्धियों को देखने से मना किये जाने पर सती अत्यन्त दुखी हुई। उन सबके स्नेह के कारण उसकी आँखों से अश्रु गिरने लगे। थरथराती एवं अत्यधिक व्याकुल होकर उसने अपने अद्वितीय पति भगवान् शंकर को इस प्रकार से देखा मानो वह अपनी दृष्टि से उन्हें भस्म करने जा रही हो।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में प्रयुक्त अप्रतिपूरुषम् शब्द का अर्थ है, “जिसकी बराबरी का कोई अन्य न हो।” इस जगत में शिवजी की समता का कोई भी व्यक्ति नहीं है। उनकी पत्नी सती को पता था कि उसका पति समदर्शी है, तो फिर इस बार वे अपनी पत्नी पर इतने निष्ठुर क्यों थे कि उसे अपने मायके नहीं जाने दे रहे थे? इससे उसे असह्य पीड़ा हो रही थी और वह अपने पति को इस प्रकार देख रही थी मानो उसे अपनी दृष्टि से भस्मसात्
कर देगी। दूसरे शब्दों में, चूँकि शिव आत्मा हैं (शिव का अर्थ आत्मा भी है) इसलिए सती आत्महत्या करने को उद्यत थी। अप्रतिपूरुष का दूसरा अर्थ है, “वह महापुरुष जिसका कोई प्रतिद्वन्द्वी नहीं है।” चूँकि शिवजी को आज्ञा देने के लिए राजी नहीं किया जा सका, अत: सती ने स्त्री के उस अन्तिम अस्त्र, रोदन, का सहारा लिया, जिससे पति बाध्य होकर अपनी पत्नी के प्रस्ताव को मान लेता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥