श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 4: सती द्वारा शरीर-त्याग  »  श्लोक 21

 
श्लोक
मा व: पदव्य: पितरस्मदास्थिता
या यज्ञशालासु न धूमवर्त्मभि: ।
तदन्नतृप्तैरसुभृद्‌भिरीडिता
अव्यक्तलिङ्गा अवधूतसेविता: ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
मा—नहीं हैं; व:—तुम्हारे; पदव्य:—ऐश्वर्य; पित:—हे पिता; अस्मत्-आस्थिता:—हमारे द्वारा प्राप्त; या:—जो (ऐश्वर्य); यज्ञ शालासु—यज्ञ की अग्नि में; न—नहीं; धूम-वर्त्मभि:—यज्ञों के पथ द्वारा; तत्-अन्न-तृप्तै:—यज्ञ के अन्न द्वारा तृप्त; असु भृद्भि:—शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाला; ईडिता:—प्रशंसित; अव्यक्त-लिङ्गा:—जिसका कारण प्रकट नहीं है; अवधूत-सेविता:—स्वरूपसिद्ध व्यक्तियों द्वारा प्राप्त ।.
 
अनुवाद
 
 हे पिता, हमारे पास जो ऐश्वर्य है उसकी कल्पना कर पाना न तो आपके लिए और न आपके चाटुकारो के लिए सम्भव है, क्योंकि जो पुरुष महान् यज्ञों को सम्पन्न करके सकाम कर्म में प्रवृत्त होते हैं, वे तो अपनी शारीरिक आवश्यकताओं को यज्ञ में अर्पित अन्न खाकर पूरा करने की चिन्ता में लगे रहते हैं। हम वैसा सोचने मात्र से ही अपने ऐश्वर्य का प्रदर्शन कर सकते हैं। ऐसा वे ही कर सकते हैं, जो विरक्त, स्वरूपसिद्ध महापुरुष हैं।
 
तात्पर्य
 सती के पिता इस भुलावे में थे कि वे प्रतिष्ठा तथा ऐश्वर्य दोनों में बड़े हैं और उन्होंने अपनी कन्या ऐसे व्यक्ति को दी है, जो न केवल निर्धन है, वरन् समस्त संस्कृति से रहित है। उनके पिता यह सोचते रहे होंगे कि यद्यपि मेरी पुत्री परम साध्वी है और अपने पति की अनुगामिनी है, किन्तु उसके पति की दशा दयनीय है। ऐसे विचारों के प्रत्युत्तर में सती ने कहा कि उनके पति के ऐश्वर्य को दक्ष जैसे भौतिकतावादी व्यक्ति तथा उनके अनुचर नहीं समझ सकते जो झूठी बड़ाई करने वाले तथा सकाम कर्मों में लगे रहने वाले हैं। उनके पति की स्थिति सर्वथा भिन्न थी। उनके पास सारा ऐश्वर्य था, किन्तु वे उसका प्रदर्शन करना नहीं चाहते थे। अत: ऐसे ऐश्वर्य को अव्यक्त कहा जाता है। किन्तु यदि आवश्यकता पड़े तो इच्छा मात्र से वे अपना अद्भुत ऐश्वर्य दिखला सकते हैं और ऐसी घटना का यहाँ पूर्वाभास मिलता है क्योंकि ऐसा शीघ्र ही घटनेवाला है। शिव द्वारा अधिकृत ऐश्वर्य का भोग वैराग्य तथा ईश्वरप्रेम में किया जा सकता है, इन्द्रियतृप्ति के लिए अपनाये जाने वाली भौतिक विधियों के द्वारा नहीं। ऐसे ऐश्वर्य के स्वामी कुमारगण, नारद तथा शिव जैसे महापुरुष हैं, अन्य कोई नहीं। इस श्लोक में वैदिक अनुष्ठान करने वालों की भर्त्सना की गई है। उन्हें धूम वर्त्मभि: कहा गया है अर्थात् जो यज्ञ के उच्छिष्ट अन्न से अपना पोषण करते हैं। यज्ञ में दो प्रकार के अन्नों की भेंट अर्पित की जाती है। एक तो सकाम आनुष्ठानिक यज्ञों में चढ़ाया अन्न तथा दूसरा है, विष्णु को चढ़ाया गया अन्न जो सर्वोत्तम होता है। यद्यपि यज्ञ की वेदी में सभी प्रकार से विष्णु ही प्रमुख देव हैं, किन्तु सकाम अनुष्ठानों के कर्ता कुछ-न-कुछ भौतिक सम्पन्नता प्राप्त करने के उद्देश्य से विभिन्न देवताओं को प्रसन्न करना चाहते हैं। किन्तु वास्तविक यज्ञ का उद्देश्य तो विष्णु को प्रसन्न करना है और ऐसे यज्ञों के अवशेष भक्ति को बढ़ाने में लाभप्रद हैं। विष्णु के अतिरिक्त अन्य को लक्ष्य बनाकर किये जाने वाले यज्ञों के करने से उन्नति की प्रक्रिया अत्यन्त मन्द होती है। इसीलिए इस श्लोक में इसकी भर्त्सना की गई है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ने अनुष्ठान सम्मन्न कराने वालों को कौवों की तरह बताया है, क्योंकि कौवों को कूड़ेदान में फेंका गया जूठन खाने में आनन्द मिलता है। सती ने यज्ञ कराने के लिए उपस्थित समस्त ब्राह्मणों की भी भर्त्सना की।
भले ही राजा दक्ष तथा उनके प्रशंसकों ने शिव की स्थिति को समझा हो या नहीं, सती अपने पिता को यह बता देना चाहती थीं कि उन्हें यह कदापि नहीं सोचना चाहिए कि उनके पति ऐश्वर्य से विहीन हैं। शिवजी की निष्ठावान पत्नी होने के कारण सती शिव के उपासकों को सभी प्रकार का भौतिक ऐश्वर्य प्रदान करती हैं। इस तथ्य की व्याख्या श्रीमद्भागवत में दशम स्कन्ध में की गई है। कभी-कभी शिव के उपासक भगवान् विष्णु के उपासकों से अधिक ऐश्वर्यवान लगते हैं, क्योंकि दुर्गा अथवा सती सांसारिक कार्य कलापों की अधीक्षक हैं, और अपने पति को यशस्वी बनाने के लिए वे उपासकों को सभी प्रकार का भौतिक ऐश्वर्य प्रदान करती रहती हैं, जबकि विष्णु के उपासक तो आध्यात्मिक उन्नति के निमित्त हैं, अत: कभी-कभी उनका भौतिक ऐश्वर्य घटता प्रतीत होता है। दशम स्कंध में ये सारी बातें सुन्दर ढंग से समझाई गईं हैं।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥