श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 4: सती द्वारा शरीर-त्याग  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक
कृत्वा समानावनिलौ जितासना
सोदानमुत्थाप्य च नाभिचक्रत: ।
शनैर्हृदि स्थाप्य धियोरसि स्थितं
कण्ठाद्भ्रुवोर्मध्यमनिन्दितानयत् ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
कृत्वा—स्थापित करके; समानौ—साम्यावस्था में; अनिलौ—प्राण तथा अपान वायुओं को; जित-आसना—आसन को वश में करके; सा—वह (सती); उदानम्—प्राण वायु; उत्थाप्य—उठाकर; च—तथा; नाभि-चक्रत:—नाभिचक्र पर; शनै:—धीरे धीरे; हृदि—हृदय में; स्थाप्य—स्थापित करके; धिया—बुद्धि से; उरसि—फुफ्फुस मार्ग की ओर; स्थितम्—स्थापित की जाकर; कण्ठात्—कंठ से होकर; भ्रुवो:—भौंहों के; मध्यम्—बीच में; अनिन्दिता—निष्कलंक (सती); आनयत्—ऊपर ले गई ।.
 
अनुवाद
 
 सबसे उन्होंने अपेक्षित रीति से आसन जमाया और फिर प्राणवायु को ऊपर खींचकर नाभि के निकट सन्तुलित अवस्था में स्थापित कर दिया। तब प्राणवायु को उत्थापित करके, बुद्धिपूर्वक उसे वे हृदय में ले गईं और फिर धीरे-धीरे श्वास मार्ग से होते हुए क्रमश: दोनों भौंहों के बीच में ले आईं।
 
तात्पर्य
 यौगिक क्रिया शरीर के भीतर षट्चक्रों में घूमती हुई वायु का निरोध है। वायु को उदर से नाभि, नाभि से हृदय, हृदय से कंठ, कंठ से दोनों भौंहों के बीच में और अन्त में भौंहों के मध्य से मस्तिष्क के शीर्ष भाग में ले जाया जाता है। योगाभ्यास की यही क्रिया है। वास्तविक योगपद्धति के अभ्यास के पूर्व मनुष्य को आसनों का अभ्यास करना होता है, क्योंकि इससे श्वास की क्रियाओं में सहायता मिलती है और ऊपर तथा नीचे की ओर जाने वाली वायु का संयमन हो सकता है। योग की सर्वोच्च सिद्धावस्था प्राप्त करने के लिए इस विशाल तकनीक का अभ्यास करना होता है, किन्तु यह अभ्यास इस युग के लिए नहीं है। इस युग में कोई भी योग में सिद्धि प्राप्त नहीं कर सकता। किन्तु कुछ लोग आसनों का अभ्यास करते हैं, जो एक तरह से व्यायाम ही है। ऐसे शारीरिक व्यायाम से रक्त संचार अच्छा हो सकता है और शरीर स्वस्थ रह सकता है, किन्तु यदि कोई इन्हीं व्यायामों तक अपने को सीमित रखता है, तो उसे उच्चतम सिद्धावस्था प्राप्त नहीं हो सकती। केशव-श्रुति में योगक्रिया का वर्णन मिलता है, जिसमें बताया गया है कि प्राणशक्ति को किस प्रकार इच्छानुसार नियंत्रित किया जा सकता है और एक शरीर से दूसरे में या एक स्थान से दूसरे स्थान में ले जाया जा सकता है। दूसरे शब्दों में, योगाभ्यास शरीर को स्वस्थ रखने के लिए नहीं होता। आध्यात्मिक अनुभूति की कोई भी दिव्य क्रिया स्वत: ही शरीर को ठीक रखती है, क्योंकि आत्मा से शरीर सदा स्वस्थ रहता है। ज्योंही आत्मा शरीर को त्याग देता है, शरीर सडऩे लगता है। कोई भी आध्यात्मिक क्रिया बाह्य प्रयास के बिना ही शरीर को स्वस्थ रखती है, किन्तु यदि कोई यह सोचता है कि योग की परिणति का अन्तिम लक्ष्य शरीर की रक्षा है, तो वह भूल करता है। योग की वास्तविक सिद्धि तो आत्मा को उच्च पद पर पहुँचाना है, अथवा आत्मा को भौतिक बन्धन से मुक्ति दिलाना है। कुछ योगी आत्मा को उच्चतर लोकों तक ऊपर उठाने का प्रयास करते हैं, जहाँ का जीवन-स्तर इस लोक से भिन्न है और भौतिक सुविधाएँ, जीवनकाल तथा आत्म-साक्षात्कार की अन्य सुविधाएँ अधिक हैं। कुछ योगी आत्मा को वैकुण्ठलोक तक ले जाने का प्रयास करते हैं। भक्तियोग से तो आत्मा सीधे वैकुण्ठलोक जाता है जहाँ जीवन आनन्द तथा ज्ञान से नित्य पूर्ण रहता है फलत: भक्तियोग को समस्त योग पद्धतियों में श्रेष्ठ समझा जाता है।
 
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