श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 4: सती द्वारा शरीर-त्याग  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक
एवं स्वदेहं महतां महीयसा
मुहु: समारोपितमङ्कमादरात् ।
जिहासती दक्षरुषा मनस्विनी
दधार गात्रेष्वनिलाग्निधारणाम् ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; स्व-देहम्—अपना शरीर; महताम्—महान् सन्तों का; महीयसा—अत्यन्त पूज्य; मुहु:—पुन: पुन:; समारोपितम्—आसीन; अङ्कम्—गोद में; आदरात्—आदरपूर्वक; जिहासती—त्यागने की इच्छा से पूर्ण; दक्ष-रुषा—दक्ष के प्रति रोष के कारण; मनस्विनी—स्वेच्छा से; दधार—स्थापित किया; गात्रेषु—शरीर के अंगों में; अनिल-अग्नि-धारणाम्— अग्नि तथा वायु का ध्यान ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार महर्षियों तथा सन्तों द्वारा आराध्य शिव की गोद में जिस शरीर को अत्यन्त आदर तथा प्रेम से बैठाया गया था, अपने पिता के प्रति रोष के कारण सती ने अपने उस शरीर का परित्याग करने के लिए अपने शरीर के भीतर अग्निमय वायु का ध्यान करना प्रारम्भ कर दिया।
 
तात्पर्य
 शिवजी को यहाँ पर समस्त महात्माओं में श्रेष्ठ बताया गया है। यद्यपि दक्ष ने सती के शरीर को उत्पन्न किया था, किन्तु शिवजी सती को अपनी गोद में बैठा कर विभूषित किया करते थे। इसे आदर का बड़ा प्रतीक माना जाता है। इस प्रकार सती का शरीर सामान्य न था, तो भी सती ने उसका परित्याग करने का निश्चय किया, क्योंकि दक्ष से सम्बन्धित होने के कारण वह दुख का कारण बना हुआ था। सती द्वारा स्थापित इस गम्भीर उदाहरण का अनुकरण किया जाना चाहिए। मनुष्य को चाहिए कि ऐसे व्यक्तियों की संगति करते समय सावधान रहे, जो उच्च अधिकारियों के प्रति अवज्ञा करते हैं। अत: वैदिक साहित्य में शिक्षा दी गई है कि मनुष्य नास्तिकों तथा अभक्तों की संगति से दूर रहे और भक्तों की संगति करने का यत्न करे, क्योंकि भक्तों की संगति से वह आत्म-साक्षात्कार के पद तक उठ सकता है। श्रीमद्भागवत में कई स्थलों पर इस पर बल दिया गया है; यदि कोई सांसारिक बन्धनों से मुक्त होना चाहता है, तो उसे महात्माओं की संगति करनी चाहिए और यदि सांसारिकता को बनाये रखना है, तो संसारी पुरुषों की संगति करनी चाहिए। जीवन की भौतिकतावादी पद्धति विषयी जीवन पर आधारित है। इस प्रकार विषयी जीवन में लिप्त रहना और विषयी लोगों की संगति करना, इन दोनों की वैदिक साहित्य में भर्त्सना की गई है, क्योंकि ऐसी संगति से आध्यात्मिक उन्नति में अवरोध आएगा। किन्तु महापुरुषों तथा भक्तों की संगति करने से आध्यात्मिक स्तर उठता है। सती देवी ने अपना शरीर त्यागने का निश्चय किया, क्योंकि वह उन्हें दक्ष से प्राप्त हुआ था। वे अपने को दूसरे शरीर में स्थानान्तरित करना चाह रही थीं जिससे वे भगवान् शिव की निष्कलुष संगति कर सकें। वस्तुत: यह स्पष्ट है कि अगले जीवन में वे हिमालय की कन्या पार्वती के रूप में जन्म लेंगी और तब वे फिर से शिव को पति रूप में स्वीकार करेंगी। सती तथा शिव का सम्बन्ध सनातन है, यहाँ तक कि शरीर बदलने पर भी उनका सम्बन्ध-विच्छेद नहीं होता।
 
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