श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 4: सती द्वारा शरीर-त्याग  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक
तत: स्वभर्तुश्चरणाम्बुजासवं
जगद्गुरोश्चिन्तयती न चापरम् ।
ददर्श देहो हतकल्मष: सती
सद्य: प्रजज्वाल समाधिजाग्निना ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—वहाँ; स्व-भर्तु:—अपने पति का; चरण-अम्बुज-आसवम्—चरणकमलों के अमृत पर; जगत्-गुरो:—ब्रह्माण्ड के गुरु का; चिन्तयती—चिन्तन करती हुई; न—नहीं; च—तथा; अपरम्—दूसरा (अपने पति के अतिरिक्त); ददर्श—देखा; देह:— शरीर; हत-कल्मष:—पाप का विनाश होकर; सती—सती; सद्य:—तुरन्त; प्रजज्वाल—जल गई; समाधि-ज-अग्निना—ध्यान से उत्पन्न अग्नि द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 सती ने अपना सारा ध्यान अपने पति जगद्गुरु शिव के पवित्र चरणकमलों पर केन्द्रित कर दिया। इस प्रकार वे समस्त पापों से शुद्ध हो गईं। उन्होंने अग्निमय तत्त्वों के ध्यान द्वारा प्रज्ज्वलित अग्नि में अपने शरीर का परित्याग कर दिया।
 
तात्पर्य
 सती ने तत्क्षण अपने पति शिवजी के चरणकमलों का ध्यान किया, जो भौतिक जगत का संचालन करने वाले तीन देवताओं में से एक हैं। उन्हें चरणकमलों का ध्यान धरने से ही इतना आनन्द मिला कि वे अपने शरीर के सारे सम्बन्ध भूल गईं। यह आनन्द निश्चय ही भौतिक था, क्योंकि उन्होंने अपने शरीर को एक अन्य भौतिक शरीर प्राप्त करने के उद्देश्य से त्यागा था। किन्तु इस उदाहरण से हम भक्त के उस आनन्द का अनुमान लगा सकते हैं, जो वह अपने मन को भगवान् विष्णु या कृष्ण के चरणकमलों में ध्यान केन्द्रित करके प्राप्त करता है। भगवान् के चरणकमलों पर केवल ध्यान लगाने में ऐसा दिव्य आनन्द मिलता है कि मनुष्य ईश्वर के दिव्य रूप के अतिरिक्त सब कुछ भूल सकता है। यही योग-समाधि की सिद्धि है। इस श्लोक में बताया गया है कि ऐसे ध्यान से सती समस्त कल्मष से मुक्त हो गई। यह कल्मष क्या था? यह कल्मष दक्ष से प्राप्त देहात्म-बुद्धि के रूप में था, किन्तु समाधि में उन्हें यह सब भूल गया। तात्पर्य यह है कि जब मनुष्य इस भौतिक जगत में समस्त शारीरिक सम्बन्धों से मुक्त हो जाता है और अपने को परमेश्वर का मात्र शाश्वत दास मान लेता है, तो यह समझना चाहिए कि समाधि की प्रज्ज्वलित अग्नि से भौतिक आसक्ति के सारे कल्मष जल गये। यह प्रज्ज्वलित अग्नि बाहर दिखे, यह आवश्यक नहीं है, क्योंकि यदि इसी जगत में रहते हुए कोई अपने सारे शारीरिक सम्बन्धों को भुला देता है और आत्मा में स्थित हो जाता है, तो यह कहा जाता है कि वह योगसमाधि की प्रज्ज्वलित अग्नि द्वारा समस्त भौतिक कल्मषों से मुक्त हो गया है। योग की सर्वोच्च सिद्धि यही है। यदि वह इस जगत में अपने शारीरिक सम्बन्ध बनाये रखता है और अपने को महान् योगी बताता है, तो वह प्रामाणिक योगी नहीं है। श्रीमद्भागवत में (२.४.१५) कहा गया है यत्कीर्तनं यत्स्मरणं। केवल भगवान् के पवित्र नाम के कीर्तन, कृष्ण के चरणकमलों के स्मरण, भगवान् की स्तुति से ही मनुष्य समाधि की प्रज्ज्वलित अग्नि द्वारा समस्त भौतिक कल्मष, देहात्मबुद्धि से तुरन्त मुक्त हो जाता है। यह प्रभाव बिना एक क्षण के विलम्ब से तत्क्षण घटित होता है।

श्रील जीव गोस्वामी के अनुसार सती द्वारा शरीर-त्याग का अर्थ है कि सती ने दक्ष से अपने सम्बन्ध को हृदय के भीतर त्याग दिया। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने भी टीका की है कि सती बहिरंगा शक्ति की अधीक्षक विग्रह हैं, अत: जब उन्होंने अपना शरीर त्यागा तो उन्हें आध्यात्मिक देह नहीं प्राप्त हुई, वरन् दक्ष द्वारा प्राप्त शरीर से उन्होंने स्थानान्तरण कर लिया। अन्य टीकाकार भी कहते हैं कि उन्होंने तुरन्त अपने आपको मेनका के गर्भ में स्थापित कर लिया, जो उनकी भावी माता थीं। उन्होंने दक्ष से प्राप्त शरीर को त्याग दिया और वे तुरन्त ही एक श्रेष्ठतर शरीर में स्थानान्तरित हो गईं, किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि उन्हें आध्यात्मिक शरीर प्राप्त हुआ।

 
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