श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 4: सती द्वारा शरीर-त्याग  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक
ततो विनि:श्वस्य सती विहाय तं
शोकेन रोषेण च दूयता हृदा ।
पित्रोरगात्स्त्रैणविमूढधीर्गृहान्
प्रेम्णात्मनो योऽर्धमदात्सतां प्रिय: ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—तब; विनि:श्वस्य—जोर-जोर से साँस लेते हुए; सती—सती; विहाय—त्याग कर; तम्—उसको (शिव को); शोकेन— शोक से; रोषेण—क्रोध से; च—तथा; दूयता—विह्वल; हृदा—हृदय से; पित्रो:—अपने पिता के; अगात्—चली गई; स्त्रैण— अपनी स्त्री प्रकृति के कारण; विमूढ—प्रवंचित; धी:—बुद्धि; गृहान्—घर को; प्रेम्णा—प्रेमवश; आत्मन:—अपने शरीर का; य:—जो; अर्धम्—आधा; अदात्—दे दिया; सताम्—साधु पुरुषों को; प्रिय:—प्रिय ।.
 
अनुवाद
 
 तत्पश्चात् सती अपने पति शिवजी को, जिन्होंने प्रेमवश उसे अपना अर्धांग प्रदान किया था, छोडक़र क्रोध तथा शोक के कारण लम्बी-लम्बी साँसें भरती हुई अपने पिता के घर को चली गईं। उससे यह अल्प बुद्धिमत्ता-पूर्ण कार्य उसका अबला नारी होने के फलस्वरूप हुआ।
 
तात्पर्य
 वैदिक विचारधारा के अनुसार पति अपने शरीर का आधा भाग पत्नी को और पत्नी आधा भाग पति को देती है। अर्थात् पत्नी के बिना पति और पति के बिना पत्नी अपूर्ण होते हैं। शिव तथा सती के मध्य वैदिक वैवाहिक सम्बन्ध था, किन्तु कभी-कभी स्त्री नारी-स्वभाव-जनित दुर्बलतावश अपने मायके के पारिवारिक सदस्यों के प्रति अधिक आकृष्ट रहती है और सती के साथ भी यही हुआ। इस श्लोक में यह विशेष रूप से बताया गया है कि अपनी सती शिव जैसे महान् पति को छोडऩा चाह रही थी। तात्पर्य यह है कि पति तथा पत्नी के सम्बन्ध में भी स्त्री की दुर्बलता बनी रहती है। सामान्य रूप से पति तथा पत्नी के बीच होने वाला तलाक स्त्री के आचरण के कारण होता है; इसका कारण स्त्री की दुर्बलता है। सर्वश्रेष्ठ रास्ता यही है कि पत्नी पति के आदेशों का पालन करे। इससे पारिवारिक जीवन परम शान्तिपूर्ण रहता है। कभी-कभी पति-पत्नी के मध्य कुछ गलतफहमी होती है जैसी कि शिव तथा सती जैसे उच्च पारिवारिक सम्बन्ध में हुई। किन्तु ऐसी गलतफहमी के कारण स्त्री को पति का संरक्षण नहीं त्यागना चाहिए। यदि वह ऐसा करती है, तो इसे स्त्री-दुर्बलता समझना चाहिए।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥