श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 4: सती द्वारा शरीर-त्याग  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक
सोऽयं दुर्मर्षहृदयो ब्रह्मध्रुक् च
लोकेऽपकीर्तिं महतीमवाप्स्यति ।
यदङ्गजां स्वां पुरुषद्विडुद्यतां
न प्रत्यषेधन्मृतयेऽपराधत: ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह; अयम्—यह; दुर्मर्ष-हृदय:—कठोर हृदय; ब्रह्म-ध्रुक्—ब्राह्मण होने के अयोग्य; च—तथा; लोके—संसार में; अपकीर्तिम्—अपयश; महतीम्—अत्यधिक; अवाप्स्यति—प्राप्त करेगा; यत्-अङ्ग-जाम्—जिसकी पुत्री; स्वाम्—अपने; पुरुष द्विट्—शिव का शत्रु; उद्यताम्—उद्यत, तैयार; न प्रत्यषेधत्—रोका नहीं; मृतये—मृत्यु से; अपराधत:—अपने अपराधों के कारण ।.
 
अनुवाद
 
 ऐसा दक्ष जो इतना कठोर-हृदय है कि ब्राह्मण होने के अयोग्य है, वह अपनी पुत्री के प्रति किये गये अपराधों के कारण अतीव अपयश को प्राप्त होगा, क्योंकि उसने अपनी पुत्री को मरने से नहीं रोका और वह भगवान् के प्रति अत्यन्त द्वेष रखता था।
 
तात्पर्य
 दक्ष को यहाँ पर अत्यन्त कठोर-हृदय कहकर ब्राह्मण होने के अयोग्य बतलाया गया है। कोई-कोई टीकाकार ब्रह्म-ध्रुक् का अर्थ ब्राह्मणों का मित्र लगाते हैं। जो व्यक्ति ब्राह्मण कुल में उत्पन्न होकर ब्राह्मण के गुणों से रहित होता है, वह ब्रह्म-बन्धु कहा जाता है। ब्राह्मण लोग सामान्यत: अत्यन्त कोमल-हृदय और सहिष्णु होते हैं, क्योंकि वे मन तथा इन्द्रिय को वश में रखना जानते हैं। किन्तु दक्ष सहिष्णु न था। केवल इसलिए कि उसके जामाता शिव उसके सम्मान में खड़े नहीं हुए, वह क्रुद्ध हो गया। वह इतना कठोर-हृदय था कि उसने अपनी परम प्रिय पुत्री की मृत्यु भी सहन कर ली। दामाद तथा श्वसुर के बीच उत्पन्न भ्रान्ति को दूर करने के लिए बिना आमंत्रण के अपने पिता के घर जाना और वहाँ पर दक्ष द्वारा उसका स्वयं का सत्कार न होना—इन सबको भुलाने का सती ने भरसक प्रयत्न किया। किन्तु दक्ष इतना कठोर-हृदय निकला कि वह आर्य या ब्राह्मण कहलाने के अयोग्य था। उसकी अपकीर्ति अभी तक चल रही है। दक्ष का अर्थ है ‘पटु’ और उसे यह नाम इसलिए प्राप्त था, क्योंकि उसने सैकड़ों-हजारों सन्तानें उत्पन्न की थीं। जो लोग अत्यन्त विषयी और भौतिकतावादी हैं, वे इतने कठोर-हृदय हो जाते हैं कि वे अपनी तनिक भी मान-हानि होने पर, अपनी सन्तान की मृत्यु को भी सहन कर सकते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥