श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 4: सती द्वारा शरीर-त्याग  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक
वदत्येवं जने सत्या दृष्ट्वासुत्यागमद्भुतम् ।
दक्षं तत्पार्षदा हन्तुमुदतिष्ठन्नुदायुधा: ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
वदति—बातें कर रहे थे; एवम्—इस प्रकार; जने—जबकि लोग; सत्या:—सती की; दृष्ट्वा—देखकर; असु-त्यागम्—मृत्यु, देह-त्याग; अद्भुतम्—आश्चर्यमय; दक्षम्—दक्ष; तत्-पार्षदा:—शिव के अनुचर; हन्तुम्—मारने के लिए; उदतिष्ठन्—उठकर खड़े हुए; उदायुधा:—अपने हथियार उठाये ।.
 
अनुवाद
 
 जिस समय सब लोग सती की आश्चर्यजनक स्वेच्छित मृत्यु के विषय में परस्पर बातें कर रहे थे, उसी समय शिव के पार्षद, जो सती के साथ आये थे, अपने-अपने हथियार लेकर दक्ष को मारने के लिए उद्यत हो गये।
 
तात्पर्य
 सती के साथ जो पार्षद आये थे, वे विपत्तियों से उनकी रक्षा करने के लिए थे, किन्तु वे अपने स्वामी की पत्नी की रक्षा करने में असमर्थ सिद्ध हुए, इसलिए उनके लिए वे मरने का मन बना चुके थे और मरने के पूर्व वे दक्ष को मार डालना चाहते थे। अनुचरों का कर्तव्य है कि अपने स्वामी को सुरक्षा प्रदान करें, किन्तु यदि वे इसमें असफल रहें तो उन्हें मर जाना चाहिए।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥