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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 4: सती द्वारा शरीर-त्याग  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  4.4.6 
आब्रह्मघोषोर्जितयज्ञवैशसं
विप्रर्षिजुष्टं विबुधैश्च सर्वश: ।
मृद्दार्वय:काञ्चनदर्भचर्मभि-
र्निसृष्टभाण्डं यजनं समाविशत् ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
—चारों ओर से; ब्रह्म-घोष—वैदिक मंत्रों की ध्वनियों से; ऊर्जित—सजाया; यज्ञ—यज्ञ; वैशसम्—पशु बलि; विप्रर्षि जुष्टम्—जुटे हुए ऋषि; विबुधै:—देवताओं से; —तथा; सर्वश:—सभी दिशाओं में; मृत्—मिट्टी के; दारु—काठ के; अय:—लोह; काञ्चन—सोने के; दर्भ—कुश; चर्मभि:—खालों से; निसृष्ट—बने; भाण्डम्—बलि पशु तथा भांडे (बर्तन); यजनम्—यज्ञ; समाविशत्—प्रवेश किया ।.
 
अनुवाद
 
 तब सती अपने पिता के घर पहुँची जहाँ यज्ञ हो रहा था और उसने यज्ञस्थल में प्रवेश किया जहाँ वैदिक स्तोत्रों का उच्चारण हो रहा था। वहाँ सभी ऋषि, ब्राह्मण तथा देवता एकत्र थे। वहाँ पर अनेक बलि-पशु थे और साथ ही मिट्टी, पत्थर, सोने, कुश तथा चर्म के बने पात्र थे जिनकी यज्ञ में आवश्यकता पड़ती है।
 
तात्पर्य
 जब विद्वान् साधु तथा ब्राह्मण वैदिक मंत्रों के उच्चारण हेतु एकत्र होते हैं, तो उनमें से कुछ शास्त्रार्थ में लगे रहते हैं। इस प्रकार कुछ साधु तथा ब्राह्मण शास्त्रार्थ कर रहे थे और कुछ मंत्रोच्चारण कर रहे थे। इस प्रकार सारा वातावरण दिव्य ध्वनियों से व्याप्त था। इस दिव्य ध्वनि को हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे, हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे। मंत्र में सरल रूप दे दिया गया है। इस युग में लोग अत्यन्त आलसी, मन्द तथा अभागे हैं, अत: वे वैदिक ज्ञान में उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते। इसीलिए भगवान् चैतन्य ने हरे कृष्ण ध्वनि की संस्तुति की है। श्रीमद्भागवत में (११.५.३२) भी संस्तुति है यज्ञै: संकीर्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधस:। इस समय यज्ञ की आवश्यक वस्तुओं को एकत्र कर पाना कठिन है, क्योंकि लोग निर्धन हैं और उन्हें वैदिक मंत्रों का ज्ञान नहीं है। अत: इस युग में यह सलाह दी जाती है कि लोग एकत्र होकर श्रीभगवान् को, जो अपने पार्षदों के साथ रहते हैं, प्रसन्न करने के लिए हरे कृष्ण मंत्र का कीर्तन करें। अप्रत्यक्ष रूप से यह भगवान् चैतन्य के लिए है, जो नित्यानन्द, अद्वैत आदि अपने पार्षदों के साथ रहते हैं। इस युग में यज्ञ सम्पन्न करने की यही विधि है।

इस श्लोक की अन्य महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उस समय बलि के लिए पशु होते थे। किन्तु बलि के पशु का यह अर्थ नहीं है कि वे वध किये जाने के लिए होते थे। बड़े-बड़े ऋषि तथा ज्ञानी पुरुष यज्ञ किया करते थे और उनकी सफलता (अनुभूति) का परीक्षण पशु बलि द्वारा किया जाता था जिस प्रकार कि आधुनिक विज्ञान में किसी विशेष ओषधि के प्रभाव की परीक्षा पशुओं पर की जाती है। वे ब्राह्मण, जिन पर यज्ञ का भार रहता था, अत्यन्त सिद्ध पुरुष होते थे और वे अपनी सिद्धि की परीक्षा करने के लिए बूढ़े पशु की बलि अग्नि में देते और उसे पुन: जीवन प्रदान करते थे। वैदिक मंत्र की यही परीक्षा थी। वहाँ पर एकत्र पशु मार कर खाने के लिए नहीं होते थे। यज्ञ का वास्तविक प्रयोजन कसाईघरों का स्थान ग्रहण करना नहीं, अपितु पशु को नव जीवन प्रदान करके वैदिक मंत्र की परीक्षा करना था। पशु वैदिक मंत्रों की शक्ति के परीक्षण के लिए प्रयुक्त होते थे, मांस के लिए नहीं।

 
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