श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 4: सती द्वारा शरीर-त्याग  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक
सौदर्यसम्प्रश्नसमर्थवार्तया
मात्रा च मातृष्वसृभिश्च सादरम् ।
दत्तां सपर्यां वरमासनं च सा
नादत्त पित्राप्रतिनन्दिता सती ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
सौदर्य—अपनी बहनों का; सम्प्रश्न—समादर; समर्थ—उचित; वार्तया—कुशल समाचार; मात्रा—अपनी माता द्वारा; च— तथा; मातृ-स्वसृभि:—मौसियों द्वारा; च—तथा; स-आदरम्—आदरपूर्वक; दत्ताम्—दी गई; सपर्याम्—पूजा; वरम्—भेंटें; आसनम्—आसन; च—तथा; सा—उस; न आदत्त—ग्रहण नहीं किया; पित्रा—अपने पिता द्वारा; अप्रतिनन्दिता—समादरित न होने से; सती—सती ने ।.
 
अनुवाद
 
 यद्यपि उनकी बहनों तथा माता ने उनका स्वागत-सत्कार किया, किन्तु उन्होंने उनके स्वागत-वचनों का कोई उत्तर नहीं दिया। यद्यपि उन्हें आसन तथा उपहार दिये गये, किन्तु उन्होंने कुछ भी स्वीकार नहीं किया, क्योंकि उनके पिता न तो उनसे बोले और न उनका कुशल-क्षेम पूछ कर उनका स्वत्कार किया।
 
तात्पर्य
 सती ने अपनी बहनों तथा माता द्वारा दी गई भेंटें स्वीकार नहीं कीं, क्योंकि वह अपने पिता की चुप्पी से तनिक भी संतुष्ट न थी। सती दक्ष की सबसे छोटी कन्या थी और उसे पता था कि वह उसकी अत्यधिक चहेती पुत्री थी। किन्तु अब, शिव की संगति होने से पिता ने अपनी पुत्री के सारे प्यार को भुला दिया था जिससे उसे अत्यधिक ठेस पहुँची। भौतिक देहात्म-बुद्धि इतनी दूषित होती है कि थोड़े से उकसावे से भी हमारे प्रेम तथा स्नेह के सारे बन्धन टूट जाते हैं। शारीरिक सम्बन्ध इतने क्षणिक हैं कि भले ही कोई किसी को कितना ही स्नेह क्यों न करता रहा हो, थोड़ी सी नाराजगी में सारी घनिष्ठता छिन्न हो जाती है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥