श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 4: सती द्वारा शरीर-त्याग  »  श्लोक 9

 
श्लोक
अरुद्रभागं तमवेक्ष्य चाध्वरं
पित्रा च देवे कृतहेलनं विभौ ।
अनाद‍ृता यज्ञसदस्यधीश्वरी
चुकोप लोकानिव धक्ष्यती रुषा ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
अरुद्र-भागम्—शिव का यज्ञभाग न पाकर; तम्—उसे; अवेक्ष्य—देखकर; च—तथा; अध्वरम्—यज्ञस्थल; पित्रा—अपने पिता द्वारा; च—तथा; देवे—शिव की; कृत-हेलनम्—अवहेलना करके; विभौ—स्वामी के; अनादृता—अनादर की गई; यज्ञ सदसि—यज्ञ की सभा में; अधीश्वरी—सती; चुकोप—अत्यधिक क्रुद्ध हुई; लोकान्—चौदहों लोक; इव—मानो; धक्ष्यती— जलाती हुई; रुषा—क्रोध से ।.
 
अनुवाद
 
 यज्ञस्थल में जाकर सती ने देखा कि उनके पति शिवजी का कोई यज्ञ भाग नहीं रखे गये हैं। तब उन्हें यह आभास हुआ कि उनके पिता ने शिव को आमंत्रित नहीं किया; उल्टे जब दक्ष ने शिव की पूज्य पत्नी को देखा तो उसने उसका भी आदर नहीं किया। अत: इससे वे अत्यन्त क्रुद्ध हुईं; यहां तक कि वह और अपने पिता को इस प्रकार देखने लगीं मानो उसे अपने नेत्रों से भस्म कर देंगी।
 
तात्पर्य
 वैदिक मंत्र स्वाहा का उच्चारण करते हुए जब अग्नि में आहुतियाँ डाली जाती हैं, तो समस्त देवताओं, मुनियों तथा पितरों का, जिनमें ब्रह्मा, शिव तथा विष्णु सम्मिलित हैं, सम्मान किया जाता है। परम्परा चली आई है कि सम्मान पाने वालों में शिव एक माने जाते हैं। किन्तु सती ने यज्ञस्थल में उपस्थित होकर देखा कि ब्राह्मण लोग नम: शिवाय स्वाहा मंत्र का उच्चारण करके शिव को आहुति नहीं दे रहे थे। वे अपने लिए दुखी न थीं, क्योंकि वे अपने पिता के घर बिना बुलाये आने को
तैयार थीं, किन्तु वे यह देखना चाहती थीं कि उनके पति का आदर किया जा रहा है या नहीं। अपने सम्बन्धियों, अपनी बहनों तथा माता से भेंट करना उतना महत्त्वपूर्ण न था, क्योंकि जब उनकी माता तथा बहनों ने स्वागत-सत्कार किया, तो सती ने उसकी परवाह नहीं की, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि यज्ञ में उनके पति का अपमान हो रहा है। जब उन्होंने उस अपमान को स्वयं देख लिया तो वे अत्यधिक क्रुद्ध हुईं और अपने पिता को इतने रोष से देखा मानो दक्ष को अपनी दृष्टि से भस्म कर देंगी।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥