श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 5: दक्ष के यज्ञ का विध्वंस  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक
यस्त्वन्तकाले व्युप्तजटाकलाप:
स्वशूलसूच्यर्पितदिग्गजेन्द्र: ।
वितत्य नृत्यत्युदितास्त्रदोर्ध्वजान्
उच्चाट्टहासस्तनयित्नुभिन्नदिक् ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो (शिव); तु—लेकिन; अन्त-काले—प्रलय से समय; व्युप्त—छिटका कर; जटा-कलाप:—अपने बालों का गुच्छा; स्व-शूल—अपना त्रिशूल; सूचि—नोकों पर; अर्पित—बिंधा हुआ; दिक्-गजेन्द्र:—विभिन्न दिशाओं के शासक; वितत्य— बिखेर कर; नृत्यति—नाचता है; उदित—ऊपर उठाये; अस्त्र—हथियार; दो:—हाथ; ध्वजान्—झंडे; उच्च—ऊँचे स्वर से; अट्ट हास—जोर की हँसी; स्तनयित्नु—घोर गर्जना से; भिन्न—विभाजित; दिक्—दिशाएँ ।.
 
अनुवाद
 
 प्रलय के समय, शिव के बाल बिखर जाते हैं और वे अपने त्रिशूल से विभिन्न दिशाओं के शासकों (दिक्पतियों) को बेध लेते हैं। वे गर्वपूर्वक अट्टहास करते हुए ताण्डव नृत्य करते हैं और दिक्पतियों की भुजाओं को पताकाओं के समान बिखेर देते हैं, जिस प्रकार मेघों की गर्जना से समस्त लोकों में बादल छितरा जाते हैं।
 
तात्पर्य
 प्रसूति को अपने दामाद शिव की शक्ति का आभास था, अत: प्रलयकाल में वे जो कुछ करते हैं उसका वह वर्णन कर रही हैं। इससे संकेत मिलता है कि शिव की शक्ति इतनी अपार है कि उनके समक्ष दक्ष की कोई तुलना नहीं है। प्रलय के समय भगवान् शिव अपने हाथ में त्रिशूल लेकर दिक्पालों के ऊपर नृत्य करते हैं और उनकी जटाएँ उसी प्रकार बिखर जाती हैं जिस प्रकार बादल चारों ओर बिखर कर अखण्ड वृष्टि करते हैं। प्रलय की अन्तिम अवस्था में सभी लोक जल-मग्न हो जाते हैं और वह जलाप्लावन शिव के नृत्य के कारण होता है। यह नृत्य प्रलय-नृत्य कहलाता है। प्रसूति की समझ में आ रहा था कि आने वाला संकट दक्ष द्वारा अपनी पुत्री के निरादर से ही नहीं, वरन् शिव की प्रतिष्ठा एवं सम्मान की उपेक्षा करने से उत्पन्न हुआ है।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥