श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 5: दक्ष के यज्ञ का विध्वंस  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक
तावत्स रुद्रानुचरैर्महामखो
नानायुधैर्वामनकैरुदायुधै: ।
पिङ्गै: पिशङ्गैर्मकरोदराननै:
पर्याद्रवद्‌भिर्विदुरान्वरुध्यत ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
तावत्—शीघ्र ही; स:—वह; रुद्र-अनुचरै:—शिव के अनुयायियों द्वारा; महा-मख:—महान् यज्ञस्थल; नाना—विविध प्रकार के; आयुधै:—हथियारों सहित; वामनकै:—नाटे कदके; उदायुधै:—ऊपर उठे हुए; पिङ्गै:—श्यामाभ भूरे; पिशङ्गै:—पीले; मकर-उदर-आननै:—मगर के समान पेट तथा मुख वालों से; पर्याद्रवद्भि:—चारों ओर दौड़ते हुए; विदुर—हे विदुर; अन्वरुध्यत—घिरा हुआ था ।.
 
अनुवाद
 
 हे विदुर, शिव के समस्त अनुचरों ने यज्ञस्थल को घेर लिया। वे नाटे कद के थे और अनेक प्रकार के हथियार लिये हुए थे उनके शरीर मकर के समान कुछ-कुछ काले तथा पीले थे। वे यज्ञस्थल के चारों ओर दौड़दौडक़र उत्पात मचाने लगे।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥