श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 5: दक्ष के यज्ञ का विध्वंस  »  श्लोक 2

 
श्लोक
क्रुद्ध: सुदष्टौष्ठपुट: स धूर्जटि-
र्जटां तडिद्वह्निसटोग्ररोचिषम् ।
उत्कृत्य रुद्र: सहसोत्थितो हसन्
गम्भीरनादो विससर्ज तां भुवि ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
क्रुद्ध:—क्रुद्ध; सु-दष्ट-ओष्ठ-पुट:—अपने होठों को दाँतों से काटते हुए; स:—वह (शिव); धू:-जटि:—शरीर पर जटा धारण किये; जटाम्—एक लट; तडित्—बिजली की; वह्नि—अग्नि की; सटा—ज्वाला, लपट; उग्र—भीषण; रोचिषम्—प्रज्ज्वलित; उत्कृत्य—नोच कर; रुद्र:—शिव; सहसा—तुरन्त; उत्थित:—खड़े हो गये; हसन्—हँसते हुए; गम्भीर—गहरा; नाद:—ध्वनि; विससर्ज—पटक दिया; ताम्—उस (बाल) को; भुवि—पृथ्वी पर ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार अत्यधिक क्रुद्ध होने के कारण शिव ने अपने दाँतों से होठ चबाते हुए तुरन्त अपने सिर की जटाओं से एक लट नोच ली, जो बिजली अथवा अग्नि की भाँति जलने लगी। वे पागल की भाँति हँसते हुए तुरन्त खड़े हो गये और उस लट को पृथ्वी पर पटक दिया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥