श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 5: दक्ष के यज्ञ का विध्वंस  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक
दृष्ट्वा संज्ञपनं योगं पशूनां स पतिर्मखे ।
यजमानपशो: कस्य कायात्तेनाहरच्छिर: ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
दृष्ट्वा—देखकर; संज्ञपनम्—यज्ञ में पशुओं के वध के लिए; योगम्—युक्ति; पशूनाम्—पशुओं की; स:—वह (वीरभद्र); पति:—स्वामी; मखे—यज्ञ में; यजमान-पशो:—यजमान रूपी पशु; कस्य—दक्ष का; कायात्—शरीर से; तेन—उस (युक्ति) से; अहरत्—काट दिया; शिर:—उसका सिर ।.
 
अनुवाद
 
 तब वीरभद्र ने यज्ञशाला में लकड़ी की बनी युक्ति (करनी) देखी जिससे पशुओं का वध किया जाता था। उसने दक्ष का सिर काटने में इसका लाभ उठाया।
 
तात्पर्य
 इस प्रसंग में यह ध्यान देने की बात है कि यज्ञ में पशुओं को मारने की युक्ति इसलिए नहीं बनी थी कि उनके मांसाहार में सुविधा हो। यह वध वैदिक मंत्रों के बल पर बलि दिये जाने वाले पशु को नवीन जीवन प्रदान करने के उद्देश्य से किया जाता था। मंत्रों के परीक्षण के लिए इन पशुओं की बलि दी जाती थी और यज्ञ सम्पन्न किये जाते थे। आधुनिक युग में भी शारीरिक प्रयोगशालाओं में पशु-शरीरों पर प्रयोग किये जाते हैं। इसी प्रकार ब्राह्मण ठीक से मंत्रों का उच्चारण करते हैं या नहीं इसकी परीक्षा यज्ञस्थल पर यज्ञ द्वारा की जाती थी। कुल मिलाकर बलि दिये गये पशु किसी प्रकार घाटे में नहीं रहते थे। केवल कुछ बूढ़े पशुओं की बलि दी जाती थी, किन्तु बदले में उन्हें नवीन शरीर प्राप्त हो जाते थे। यही वैदिक मंत्रों की परीक्षा थी। वीरभद्र ने करनी का प्रयोग पशुबलि के लिए नहीं किया, परन्तु तुरंत ही उसने इससे सबों के देखते-देखते दक्ष का सिर धड़ से अलग कर दिया।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥