श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 5: दक्ष के यज्ञ का विध्वंस  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक
साधुवादस्तदा तेषां कर्म तत्तस्य पश्यताम् ।
भूतप्रेतपिशाचानां अन्येषां तद्विपर्यय: ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
साधु-वाद:—वाहवाही; तदा—उस समय; तेषाम्—उनके (शिव के अनुचरों के); कर्म—क्रिया; तत्—वह; तस्य—उस (वीरभद्र) का; पश्यताम्—देखते हुए; भूत-प्रेत-पिशाचानाम्—भूतों, प्रेतों तथा पिशाचों का; अन्येषाम्—अन्यों (दक्ष के दल) का; तत्-विपर्यय:—इसके विपरीत (शोकपूर्ण शब्द, हाहाकार) ।.
 
अनुवाद
 
 वीरभद्र के कार्य से शिवजी के दल को प्रसन्नता हुई और वह वाह-वाह कर उठा तथा जितने भी भूत, प्रेत तथा असुर वहाँ आये थे, उन सबों ने भयानक किलकारियाँ भरी। दूसरी ओर, यज्ञ का भार सँभालने वाले ब्राह्मण दक्ष की मृत्यु के कारण शोक से चीत्कार करने लगे।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥