श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 5: दक्ष के यज्ञ का विध्वंस  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक
आज्ञप्त एवं कुपितेन मन्युना
स देवदेवं परिचक्रमे विभुम् ।
मेने तदात्मानमसङ्गरंहसा
महीयसां तात सह: सहिष्णुम् ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
आज्ञप्त:—आज्ञा दी; एवम्—इस प्रकार; कुपितेन—क्रुद्ध; मन्युना—शिव द्वारा (जो साक्षात् क्रोध हैं); स:—उसने (वीरभद्र); देव-देवम्—जो देवताओं द्वारा पूजित है; परिचक्रमे—परिक्रमा की; विभुम्—शिव की; मेने—विचार किया; तदा—उस समय; आत्मानम्—स्वत:; असङ्ग-रंहसा—शिव की शक्ति से, जिसका विरोध नहीं किया जा सकता; महीयसाम्—अत्यन्त शक्तिशाली का; तात—हे विदुर; सह:—शक्ति; सहिष्णुम्—सहने में समर्थ ।.
 
अनुवाद
 
 मैत्रेय ने आगे बताया : हे विदुर, वह श्याम पुरुष भगवान् का साक्षात् क्रोध था और शिवजी के आदेशों का पालन करने के लिए उद्यत था। इस प्रकार किसी भी विरोधी शक्ति का सामना करने में अपने को समर्थ समझ कर उसने भगवान् शिव की प्रदक्षिणा की।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥