श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 5: दक्ष के यज्ञ का विध्वंस  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक
अन्वीयमान: स तु रुद्रपार्षदै-
र्भृशं नदद्‌भिर्व्यनदत्सुभैरवम् ।
उद्यम्य शूलं जगदन्तकान्तकं
सम्प्राद्रवद् घोषणभूषणाङ्‌घ्रि: ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
अन्वीयमान:—पीछे चलते हुए; स:—वह (वीरभद्र); तु—लेकिन; रुद्र-पार्षदै:—शिव के सैनिकों द्वारा; भृशम्—शोर करते हुए; नदद्भि:—गर्जते हुए; व्यनदत्—ध्वनि की; सु-भैरवम्—अत्यन्त भयानक; उद्यम्य—लेकर; शूलम्—त्रिशूल; जगत्- अन्तक—मृत्यु; अन्तकम्—मारते हुए; सम्प्राद्रवत्—(दक्ष के यज्ञ) की ओर लपके; घोषण—गर्जते हुए; भूषण-अङ्घ्रि:— अपने पैरों में कड़े पहने ।.
 
अनुवाद
 
 घोर गर्जना करते हुए शिव के अन्य अनेक सैनिक भी उस भयानक असुर के साथ हो लिए। वह एक विशाल त्रिशूल लिए हुए था, जो इतना भयानक था कि मृत्यु का भी वध करने में समर्थ था और उसके पाँवों में कड़े थे, जो गर्जना करते प्रतीत हो रहे थे।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥