श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 5: दक्ष के यज्ञ का विध्वंस  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक
वाता न वान्ति न हि सन्ति दस्यव:
प्राचीनबर्हिर्जीवति होग्रदण्ड: ।
गावो न काल्यन्त इदं कुतो रजो
लोकोऽधुना किं प्रलयाय कल्पते ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
वाता:—हवाएँ; न वान्ति—नहीं बह रही हैं; न—न तो; हि—क्योंकि; सन्ति—सम्भव है; दस्यव:—लुटेरे; प्राचीन-बर्हि:— प्राचीन राजा बर्हि; जीवति—जीवित है; ह—अब भी; उग्र-दण्ड:—जो कठोर दण्ड देगा; गाव:—गाएँ; न काल्यन्ते—हाँकी नहीं जातीं; इदम्—यह; कुत:—कहाँ से; रज:—धूलि; लोक:—लोक; अधुना—अब; किम्—क्या; प्रलयाय—प्रलय के लिए; कल्पते—आया समझा जाय ।.
 
अनुवाद
 
 आँधी के स्त्रोत के सम्बन्ध में अनुमान लगाते हुए उन्होंने कहा : न तो तेज हवाएँ चल रही हैं और न गौएं ही जा रही हैं, न यह सम्भव है कि यह धूल भरी आँधी लुटेरों द्वारा उठी है, क्योंकि अभी भी बलशाली राजा बर्हि उन्हें दण्ड देने के लिए जीवित है। तो फिर यह धूलभरी आँधी कहाँ से आ रही है? क्या इस लोक का प्रलय होने वाला है?
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में विशेष रूप से प्राचीन बर्हि: जीवति महत्त्वपूर्ण है। उस भूभाग का राजा बर्हि नाम से जाना जाता था, यथापि वह वृद्ध था किन्तु अत्यन्त शक्तिशाली शासक था। इस प्रकार चोरों तथा लुटेरों के आक्रमण की कोई सम्भावना न थी। अप्रत्यक्ष रूप से यहाँ यह कहा गया है कि जब शासक शक्तिशाली नहीं होता तभी राज्य में चोर, लुटेरे अवांछित लोग, उचक्के रहते हैं। जब न्याय के नाम पर चोरों को छुट दे दी जाती है, तो ऐसे लुटेरों तथा अवांछित लोगों से राज्य में अशान्ति फैलती है। शिवजी के सैनिकों तथा अनुचरों से उठी हुई धूलि प्रलयकालीन दृश्य उपस्थित कर रही थी। जब इस सृष्टि का संहार होना होता है, तो यह कार्य शिव ही सम्पन्न करते हैं। अत: उनके द्वारा उत्पन्न स्थिति दृश्य जगत के प्रलय काल की सी थी।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥