श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 6: ब्रह्मा द्वारा शिवजी को मनाना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक
आह्वयन्तमिवोद्धस्तैर्द्विजान् कामदुघैर्द्रुमै: ।
व्रजन्तमिव मातङ्गैर्गृणन्तमिव निर्झरै: ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
आह्वयन्तम्—बुलाते हुए; इव—मानो; उत्-हस्तै:—उठे हुए हाथों (डालियों) से; द्विजान्—पक्षियों को; काम-दुघै:—कामप्रद, मनोरथ पूरा करने वाले; द्रुमै:—वृक्षों से; व्रजन्तम्—चलते हुए; इव—मानों; मातङ्गै:—हाथियों द्वारा; गृणन्तम्—चिग्घाड़ करते; इव—मानो; निर्झरै:—झरनों के द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 वहाँ पर सीधी शाखाओं वाले ऊँचे-ऊँचे वृक्ष हैं, जो मधुर पक्षियों को बुलाते प्रतीत होते हैं और जब हाथियों के झुंड पर्वतों के पास से गुजरते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो कैलास पर्वत उनके साथ-साथ चल रहा है। जब झरनों की प्रतिध्वनि सुनाई पड़ती है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो कैलास पर्वत भी सुर में सुर मिला रहा हो।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥