श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 6: ब्रह्मा द्वारा शिवजी को मनाना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक
पर्यस्तं नन्दया सत्या: स्‍नानपुण्यतरोदया ।
विलोक्य भूतेशगिरिं विबुधा विस्मयं ययु: ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
पर्यस्तम्—घिरा हुआ; नन्दया—नन्दा नदी से; सत्या:—सती के; स्नान—स्नान से; पुण्य-तर—विशेष रूप से सुगन्धित; उदया—जल से; विलोक्य—देखकर; भूत-ईश—भूतों के स्वामी (शिव) का; गिरिम्—पर्वत; विबुधा:—देवतागण; विस्मयम्—आश्चर्य; ययु:—हुआ ।.
 
अनुवाद
 
 वहाँ पर अलकनन्दा नामक एक छोटी सी झील है, जिसमें सती स्नान किया करती थीं। यह झील विशेष रूप से शुभ है। कैलास पर्वत की विशेष शोभा देखकर सभी देवता वहाँ के ऐश्वर्य से अत्यधिक विस्त्रित थे।
 
तात्पर्य
 श्रीभागवतचन्द्र चन्द्रिका नामक भाष्य के अनुसार सती जिस जल में स्नान करती थीं वह गंगाजल था अर्थात् गंगा नदी कैलास पर्वत से होकर बहती थी। ऐसा कथन स्वीकार्य हो सकता है, क्योंकि गंगा जल शिव की जटाओं
से होकर बहता था। चूँकि गंगा जल शिव के सिर पर ठहर कर तब ब्रह्माण्ड के अन्य भागों में बहता है, अत: बहुत कुछ सम्भव है कि जिस जल से सती स्नान करती थीं और जो अत्यधिक सुवासित था, वह गंगा जल ही था।
 
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥