श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 6: ब्रह्मा द्वारा शिवजी को मनाना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक
तारहेममहारत्नविमानशतसङ्कुलाम् ।
जुष्टां पुण्यजनस्त्रीभिर्यथा खं सतडिद्घनम् ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
तार-हेम—मोती तथा सोने का; महा-रत्न—बहुमूल्य रत्न; विमान—विमानों का; शत—सैकड़ों; सङ्कुलाम्—पुंजित; जुष्टाम्— व्यक्त, भोगा गया; पुण्यजन-स्त्रीभि:—यक्षों की पत्नियों द्वारा; यथा—जिस प्रकार; खम्—आकाश; स-तडित्-घनम्—बिजली तथा बादलों से युक्त ।.
 
अनुवाद
 
 स्वर्ग के निवासियों के विमानों में मोती, सोना तथा अनेक बहुमूल्य रत्न जड़े रहते हैं। स्वर्ग के निवासियों की तुलना उन बादलों से की गई है, जो आकाश में रहकर बिजली की चमक से सुशोभित रहते हैं।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर जिन विमानों की चर्चा है, वे हमारे परिचित विमानों से भिन्न हैं। श्रीमद्भागवत तथा समस्त वैदिक साहित्य में विमान के अनेक वर्णन हैं। विभिन्न लोकों में भिन्न-भिन्न प्रकार के विमान होते हैं। इस पृथ्वी लोक में विमान यंत्रचालित हैं, किन्तु अन्य लोकों के विमान मंत्र-बल से चालित होते हैं, न कि यंत्र से। वे विशेषत: स्वर्गलोक के वासियों के आमोद-प्रमोद के लिए भी उपयोग में लाये जाते हैं जिससे वे एक लोक से दूसरे लोक में जा सकें। सिद्धलोक में तो विमान के बिना ही एक लोक से दूसरे लोक की यात्रा की जा सकती है। स्वर्ग के सुन्दर विमानों की तुलना यहाँ पर आकाश से की गई है, क्योंकि वे आकाश में उड़ते हैं। यात्रियों की तुलना बादलों से की गई है। स्वर्ग के निवासियों की मनोरम ललनाओं की तुलना बिजली से की गई है। कुल मिलाकर, उच्च लोकों से यात्रियों के साथ कैलास पर आने वाले विमान देखने में अत्यन्त मनोहर लगते थे।
 
शेयर करें
       
 
  All glories to Srila Prabhupada. All glories to वैष्णव भक्त-वृंद
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
About Us | Terms & Conditions
Privacy Policy | Refund Policy
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥