श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 6: ब्रह्मा द्वारा शिवजी को मनाना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक
हित्वा यक्षेश्वरपुरीं वनं सौगन्धिकं च तत् ।
द्रुमै: कामदुघैर्हृद्यं चित्रमाल्यफलच्छदै: ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
हित्वा—पीछे छोड़ कर; यक्ष-ईश्वर—यक्षों के स्वामी (कुबेर) का; पुरीम्—धाम, वासस्थान; वनम्—जंगल; सौगन्धिकम्— सौगन्धिक नामक; च—तथा; तत्—वह; द्रुमै:—वृक्षों से; काम-दुघै:—कामनाओं को पूरा करने वाले; हृद्यम्—आकर्षक; चित्र—चित्रित; माल्य—पुष्प; फल—फल; छदै:—पत्तियों से ।.
 
अनुवाद
 
 यात्रा करते हुए देवता सौगन्धिक वन से होकर निकले जो अनेक प्रकार के पुष्पों, फलों तथा कल्पवृक्षों से पूर्ण था। इस वन से जाते हुए उन्होंने यक्षेश्वर के प्रदेशों को भी देखा।
 
तात्पर्य
 यक्षेश्वर को कुबेर भी कहा जाता है और वे देवताओं के खजांची भी हैं। वैदिक साहित्य में उनका जो वर्णन हुआ है उसमें यह बताया गया है कि वे अत्यन्त धनी हैं। इन श्लोकों से लगता है कि कैलास कुबेर के निवासस्थान के निकट ही है। यहाँ इसका भी उल्लेख है कि वन कल्पवृक्षों से पूर्ण था। ब्रह्म-संहिता से हमें कल्पवृक्ष के विषय में जानकारी मिलती है, जो वैकुण्ठ लोक में, विशेष रूप से कृष्णलोक में पाया जाता है। यहाँ पर हमें यह पता चलता है कि ऐसे कल्पवृक्ष श्रीकृष्ण की कृपा से शिव के आवास कैलास में भी पाये जाते हैं। ऐसा लगता है कि कैलास का विशिष्ट महत्त्व है; यह प्राय: कृष्ण के धाम सदृश है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥