श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 6: ब्रह्मा द्वारा शिवजी को मनाना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक
उपलभ्य पुरैवैतद्भगवानब्जसम्भव: ।
नारायणश्च विश्वात्मा न कस्याध्वरमीयतु: ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
उपलभ्य—जानकर; पुरा—पहले से; एव—निश्चय ही; एतत्—दक्ष के यज्ञ की ये सभी घटनाएँ; भगवान्—समस्त ऐश्वर्यों के स्वामी; अब्ज-सम्भव:—कमल से उत्पन्न (ब्रह्मा); नारायण:—नारायण; च—तथा; विश्व-आत्मा—सम्पूर्ण विश्व के परमात्मा; न—नहीं; कस्य—दक्ष के; अध्वरम्—यज्ञ में; ईयतु:—गये ।.
 
अनुवाद
 
 ब्रह्मा तथा विष्णु दोनों ही पहले से जान गये थे कि दक्ष के यज्ञ-स्थल में ऐसी घटनाएँ होंगी, अत: पहले से पूर्वानुमान हो जाने से वे उस यज्ञ में नहीं गये।
 
तात्पर्य
 जैसाकि भगवद्गीता (७.२६) में कहा गया है वेदाहं समतीतानि वर्त्मानानि चार्जुन— भगवान् कहते हैं, “जो कुछ भूतकाल में घटित हो चुका है और भविष्य में जो कुछ होने जा रहा है, मैं वह सब जानता हूँ।” भगवान् विष्णु सर्वज्ञ हैं, अत: वे जानते थे कि दक्ष की यज्ञशाला में क्या होगा। इसी कारण से न तो नारायण और न ही ब्रह्माजी दक्ष के महान् यज्ञ में सम्मिलित हुए।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥