श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 6: ब्रह्मा द्वारा शिवजी को मनाना  »  श्लोक 30

 
श्लोक
वनकुञ्जरसङ्घृष्टहरिचन्दनवायुना ।
अधि पुण्यजनस्त्रीणां मुहुरुन्मथयन्मन: ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
वन-कुञ्जर—जंगली हाथी से; सङ्घृष्ट—रगड़ा गया; हरिचन्दन—चन्दन के वृक्ष; वायुना—मन्द वायु से; अधि—अधिक; पुण्यजन-स्त्रीणाम्—यक्षों की पत्नियों के; मुहु:—पुन: पुन:; उन्मथयत्—विचलित; मन:—मन ।.
 
अनुवाद
 
 ऐसा वातावरण जंगली हाथियों को विचलित कर रहा था, जो चन्दन वृक्ष के जंगल में झुंडों में एकत्र हुए थे। बहती हुई वायु अप्सराओं के मनों को अधिकाधिक इन्द्रियभोग के लिए विचलित किए जा रही थी।
 
तात्पर्य
 जब भी इस भौतिक जगत में सुन्दर वातावरण मिलता है, तो विषयीजनों के मन में तुरन्त ही काम-वासना जाग्रत हो जाती है। यह प्रवृत्ति भौतिक ब्रह्माण्ड में न केवल इस लोक में, वरन् उच्चतर लोकों में भी पाई जाती है। इस जगत में ऐसे वातावरण का मस्तिष्क पर जो प्रभाव पड़ता है, उससे सर्वथा विपरीत वैकुण्ठ लोक में होता है। वहाँ की स्त्रियाँ इस लोक की स्त्रियों से सैकड़ों-हजारों गुना अधिक सुन्दर होती हैं और वहाँ का आध्यात्मिक वातावरण भी उत्तम होता है। ऐसे मनमोहक वातावरण के होते
हुए भी वैकुण्ठलोक के वासियों का मन भगवान् के यशोगान में इतना निमग्न रहता है कि इस सुख के आगे वह काम-सुख तुच्छ प्रतीत होता है, जो भौतिक जगत के समस्त आनन्द की चरमावस्था है। दूसरे शब्दों में, श्रेष्ठतर वातावरण तथा सुविधा होने पर भी वहाँ विषयी जीवन को कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता। जैसाकि भगवद्गीता में (२.५९) कहा गया है—परं दृष्ट्वा निवर्तते— आध्यात्मिक दृष्टि से वहाँ के वासी इतने उन्नत होते हैं कि ऐसी आध्यात्मिकता की उपस्थिति में विषयी जीवन तुच्छ लगता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥