श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 6: ब्रह्मा द्वारा शिवजी को मनाना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक
वैदूर्यकृतसोपाना वाप्य उत्पलमालिनी: ।
प्राप्तं किम्पुरुषैर्दृष्ट्वा त आराद्दद‍ृशुर्वटम् ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
वैदूर्य-कृत—वैदूर्य की बनी; सोपाना:—सीढिय़ाँ; वाप्य:—झीलें; उत्पल—कमल पुष्पों की; मालिनी:—पंक्तियों से युक्त; प्राप्तम्—बसा हुआ; किम्पुरुषै:—किम्पुरुषों द्वारा; दृष्ट्वा—देखकर; ते—उन देवताओं ने; आरात्—निकट ही; ददृशु:—देखा; वटम्—बरगद का वृक्ष ।.
 
अनुवाद
 
 उन्होंने यह भी देखा कि नहाने के घाट तथा उनकी सीढिय़ाँ वैदूर्यमणि की बनी थीं। जल कमलपुष्पों से भरा था। ऐसी झीलों के निकट से जाते हुए देवता उस स्थान पर पहुँचे जहाँ एक वट वृक्ष था।
 
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥