श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 6: ब्रह्मा द्वारा शिवजी को मनाना  »  श्लोक 35

 
श्लोक
विद्यातपोयोगपथमास्थितं तमधीश्वरम् ।
चरन्तं विश्वसुहृदं वात्सल्याल्लोकमङ्गलम् ॥ ३५ ॥
 
शब्दार्थ
विद्या—ज्ञान; तप:—तपस्या; योग-पथम्—भक्ति मार्ग; आस्थितम्—स्थित; तम्—उसको (शिव को); अधीश्वरम्—इन्दियों के स्वामी; चरन्तम्—(तप इत्यादि) करते हुए.); विश्व-सुहृदम्—समस्त संसार के सखा; वात्सल्यात्—पूर्ण स्नेह से; लोक- मङ्गलम्—प्रत्येक के लिए कल्याणकर ।.
 
अनुवाद
 
 देवताओं ने शिवजी को इन्द्रिय, ज्ञान, सकाम कर्मों तथा सिद्धि मार्ग के स्वामी के रूप में स्थित देखा। वे समस्त जगत के भिन्न हैं और सबके लिए पूर्ण स्नेह रखने के कारण वे अत्यन्त कल्याणकारी हैं।
 
तात्पर्य
 शिवजी ज्ञान तथा तप से पूर्ण हैं। जो कार्य के त्रिगुणों को समझता है, वह भगवान् के भक्तिमार्ग में स्थित माना जाता है। जब तक किसी को भक्ति करने की विधियों का पूरा ज्ञान नहीं हो जाता, तब तक वह भगवान् की सेवा नहीं कर सकता।
यहाँ पर शिव को अधीश्वर कहा गया है। ईश्वर का अर्थ है ‘नियन्ता’ और अधीश्वर का विशेष अर्थ है ‘इन्द्रियों का नियन्ता’। सामान्यत: भौतिकता से दूषित हमारी इन्द्रियाँ, इन्द्रिय-तृप्ति के कार्यों में लगी रहने की ओर प्रवृत्त होती हैं, किन्तु जब कोई पुरुष ज्ञान तथा तपस्या से ऊपर उठ जाता है, तो इन्द्रियाँ पवित्र हो जाती हैं और वे भगवान् की सेवा में लग जाती हैं। शिवजी ऐसी सिद्धि के प्रतीक हैं, अत: धर्मग्रन्थों में कहा जाता है वैष्णवानां यथा शम्भु:—शिवजी वैष्णव हैं। अपने कर्मों से वे इस जगत में समस्त बद्धजीवों को सिखाते हैं कि किस प्रकार अहर्निश भक्ति में लगा जाये। इसीलिए उन्हें यहाँ लोकमंगल अर्थात समस्त बद्धजीवों के लिए कल्याणकारी कहा गया है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥