श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 6: ब्रह्मा द्वारा शिवजी को मनाना  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक
कृत्वोरौ दक्षिणे सव्यं पादपद्मं च जानुनि ।
बाहुं प्रकोष्ठेऽक्षमालाम् आसीनं तर्कमुद्रया ॥ ३८ ॥
 
शब्दार्थ
कृत्वा—रखकर; ऊरौ—जाँघ पर; दक्षिणे—दाहिनी; सव्यम्—बाँये; पाद-पद्मम्—चरणकमल; च—तथा; जानुनि—घुटने पर; बाहुम्—हाथ; प्रकोष्ठे—दाहिनी हाथ की कलाई में; अक्ष-मालाम्—रुद्राक्ष की माला; आसीनम्—बैठे हुए; तर्क-मुद्रया—तर्क मुद्रा से ।.
 
अनुवाद
 
 उनका बायाँ पैर उनकी दाहिनी जाँघ पर रखा था और उनका बायाँ हाथ बायीं जाँघ पर था। दाहिने हाथ में उन्होंने रुद्राक्ष की माला पकड़ रखी थी। यह आसन वीरासन कहलाता है। इस प्रकार वे वीरासन में थे और उनकी अँगुली तर्क-मुद्रा में थी।
 
तात्पर्य
 अष्टांग योग अभ्यास पद्धति के अनुसार यहाँ पर वर्णित आसन वीरासन कहलाता है। योगाभ्यास में आठ विभाग हैं, यथा, यम, नियम इत्यादि। वीरासन के अतिरिक्त अन्य आसन भी हैं, यथा पद्मासन, सिद्धासन। परमात्मा विष्णु की अनुभूति के स्तर तक उठे बगैर इन आसनों के अभ्यास को योग की सिद्धावस्था नहीं कहा जा सकता। शिव को योगीश्वर कहा जाता है और कृष्ण को योगेश्वर कहा जाता है। योगीश्वर इस बात का सूचक है कि जहाँ तक योगाभ्यास का प्रश्न है, शिव को कोई पछाड़ नहीं सकता जबकि योगेश्वर सूचित करता है कि कृष्ण को कोई योग की सिद्धि में पछाड़ नहीं सकता। एक अन्य सार्थक शब्द तर्क-मुद्रा है। इसमें अंगुलियाँ खुली रखी जाती हैं और दूसरी अंगुली को भुजा के सहित ऊपर उठाया जाता है, जिससे श्रोताओं पर किसी विषय वस्तु का प्रभाव पड़े। वास्तव में यह लाक्षणिक अभिव्यक्ति है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥