श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 6: ब्रह्मा द्वारा शिवजी को मनाना  »  श्लोक 4

 
श्लोक
तदाकर्ण्य विभु: प्राह तेजीयसि कृतागसि ।
क्षेमाय तत्र सा भूयान्न प्रायेण बुभूषताम् ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
तत्—देवों तथा अन्यों द्वारा वर्णित घटनाएँ; आकर्ण्य—सुनकर; विभु:—ब्रह्मा ने; प्राह—उत्तर दिया; तेजीयसि—महापुरुष; कृत-आगसि—अपराध किया गया; क्षेमाय—अपनी कुशलता के लिए; तत्र—उस प्रकार; सा—वह; भूयात् न—अच्छा नहीं है; प्रायेण—सामान्यत; बुभूषताम्—रहने की इच्छा ।.
 
अनुवाद
 
 जब ब्रह्मा ने देवताओं तथा यज्ञ में सम्मिलित होने वाले सदस्यों से सब कुछ सुन लिया तो उन्होंने उत्तर दिया; यदि तुम किसी महापुरुष की निन्दा करके उसके चरणकमलों की अवमानना करते हो तो यज्ञ करके तुम कभी सुखी नहीं रह सकते। तुम्हें इस तरह से सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती।
 
तात्पर्य
 ब्रह्मा ने देवताओं को बताया कि यद्यपि दक्ष सकाम यज्ञ-कर्मों के फल भोगना चाहता था, किन्तु जब कोई शिव जैसे महान् पुरुष का अपमान करता है, तो वह उसे भोग नहीं सकता। यह तो दक्ष के लिए अच्छा हुआ कि वह युद्ध में मारा गया, क्योंकि यदि वह जीवित रहता तो वह बारम्बार महापुरुषों के चरणकमलों को अपमानित करता। मनु के नियम के अनुसार यदि कोई व्यक्ति हत्या करता है,
तो दण्ड उसके हित में होता है, क्योंकि यदि ऐसा न हो तो वह बारम्बार हत्याएँ करके भविष्य में अपने अनेक जन्मों तक बंधन में पड़ता रहेगा। फलत: हत्यारे को राजदण्ड उचित होता है। जो अत्यधिक पापी हैं, यदि वे भगवान् की कृपा से मार डाले जाते हैं, तो यह उनके लिए अच्छा होता है। दूसरे शब्दों में, ब्रह्माजी ने देवताओं को बताया कि दक्ष का मारा जाना अच्छा ही रहा।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥