श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 6: ब्रह्मा द्वारा शिवजी को मनाना  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक
ब्रह्मोवाच
जाने त्वामीशं विश्वस्य जगतो योनिबीजयो: ।
शक्ते: शिवस्य च परं यत्तद्ब्रह्म निरन्तरम् ॥ ४२ ॥
 
शब्दार्थ
ब्रह्मा उवाच—ब्रह्मा ने कहा; जाने—जानता हूँ; त्वाम्—तुमको (शिव को); ईशम्—नियन्ता; विश्वस्य—सम्पूर्ण भौतिक जगत का; जगत:—दृश्य जगत का; योनि-बीजयो:—माता तथा पिता दोनों का; शक्ते:—शक्ति का; शिवस्य—शिव का; च—तथा; परम्—परब्रह्म; यत्—जो; तत्—वह; ब्रह्म—बिना परिवर्तन के; निरन्तरम्—बिना किसी भौतिक गुण के ।.
 
अनुवाद
 
 ब्रह्मा ने कहा : हे शिव, मैं जानता हूँ कि आप सारे भौतिक जगत के नियन्ता, दृश्य जगत के माता-पिता और दृश्य जगत से भी परे परब्रह्म हैं। मैं आपको इसी रूप में जानता हूँ।
 
तात्पर्य
 यद्यपि शिव ने ब्रह्मा को सादर नमस्कार किया था, किन्तु ब्रह्मा जानते थे कि शिव का पद उनसे बड़ा है। शिव के पद का वर्णन ब्रह्म-संहिता में इस प्रकार दिया हुआ है—भगवान् विष्णु तथा शिव की मूल स्थितियों में कोई अन्तर नहीं है, तो भी शिव भगवान् विष्णु से भिन्न हैं। वहाँ यह उदाहरण दिया गया है कि दहीे में जो दूध है, वह दूध से, जिससे दही बना है, भिन्न नहीं है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥