श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 6: ब्रह्मा द्वारा शिवजी को मनाना  »  श्लोक 49

 
श्लोक
भवांस्तु पुंस: परमस्य मायया
दुरन्तयास्पृष्टमति: समस्तद‍ृक् ।
तया हतात्मस्वनुकर्मचेत:-
स्वनुग्रहं कर्तुमिहार्हसि प्रभो ॥ ४९ ॥
 
शब्दार्थ
भवान्—आप; तु—लेकिन; पुंस:—पुरुष की; परमस्य—परम; मायया—भौतिक शक्ति द्वारा; दुरन्तया—अत्यधिक शक्ति का; अस्पृष्ट—अप्रभावित; मति:—बुद्धि; समस्त-दृक्—प्रत्येक वस्तु को देखने या जानने वाला; तया—उसी माया द्वारा; हत- आत्मसु—हृदय में मोहित; अनुकर्म-चेत:सु—जिनके हृदय सकाम कर्मों द्वारा आकृष्ट हैं; अनुग्रहम्—कृपा; कर्तुम्—करने के लिए; इह—इस प्रसंग में; अर्हसि—आकांक्षा करते हैं; प्रभो—हे भगवान्! ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवान्, आप परमात्मा की माया के मोहक प्रभाव से कभी मोहित नहीं होते। अत: आप सर्वज्ञ हैं, और जो उसी माया के द्वारा मोहित एवं सकाम कर्मों में अत्यधिक लिप्त हैं, उन पर कृपालु हों और अनुकम्पा करें।
 
तात्पर्य
 वैष्णव कभी भी बहिरंगा शक्ति के प्रभाव से मोहित नहीं होता, क्योंकि वह भगवान् की प्रेमाभक्ति में लगा रहता है। श्रीकृष्ण भगवद्गीता (७.१४) में कहते हैं—
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यताया।

मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥

“मेरी यह दैवी शक्ति अर्थात् त्रिगुणमयी माया से पार पाना दुष्कर है। परन्तु जो मेरी शरण में आ जाते हैं, वे इसे सुगमतापूर्वक तर जाते हैं।” वैष्णव को चाहिए कि माया से मोहित लोगों पर क्रुद्ध होने के बजाय उन का ख्याल रखें, क्योंकि वैष्णव की कृपा के बिना वे माया के चंगुल से नहीं छूट सकते। जो माया द्वारा तिरस्कृत हो चुके हैं उनकी रक्षा भक्तों की अनुकम्पा से होती है।

वाञ्छाकल्पतरुभ्यश्च कृपासिन्धुभ्य एव च।

पतितानां पावनेभ्यो वैष्णवेभ्यो नमो नम: ॥

“मैं भगवान् के समस्त वैष्णव भक्तों को सादर नमस्कार करता हूँ। वे कल्पतरु के समान हैं, जो सबकी इच्छाओं को पूरा करने वाले हैं। वे पतित बद्ध आत्माओं के लिए दया से ओत-प्रोत रहते हैं।” जो माया के वश में हैं, वे सकाम कर्म के प्रति आकर्षित होते हैं, किन्तु वैष्णव उपदेशक उनके हृदयों को भगवान् श्रीकृष्ण की ओर आकर्षित करता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥