श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 6: ब्रह्मा द्वारा शिवजी को मनाना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक
अथापि यूयं कृतकिल्बिषा भवं
ये बर्हिषो भागभाजं परादु: ।
प्रसादयध्वं परिशुद्धचेतसा
क्षिप्रप्रसादं प्रगृहीताङ्‌घ्रि:पद्मम् ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
अथ अपि—फिर भी; यूयम्—तुम सबों ने; कृत-किल्बिषा:—पाप करके; भवम्—शिव को; ये—तुम सभी; बर्हिष:—यज्ञ का; भाग-भाजम्—प्राप्य भाग; परादु:—से अलग कर दिया है; प्रसादयध्वम्—तुम सभी प्रसन्न होओ; परिशुद्ध-चेतसा—बिना किसी हिचक के; क्षिप्र-प्रसादम्—तुरन्त दया; प्रगृहीत-अङ्घ्रि-पद्मम्—चरणकमलों की शरण ग्रहण करके ।.
 
अनुवाद
 
 तुम लोगों ने शिव को प्राप्य यज्ञ-भाग ग्रहण करने से वंचित किया है, अत: तुम सभी उनके चरणकमलों के प्रति अपराधी हो। फिर भी, यदि तुम बिना किसी हिचक के उनके पास जाओ और उनको आत्मसमर्पण करके उनके चरणकमलों में गिरो तो वे अत्यन्त प्रसन्न होंगे।
 
तात्पर्य
 शिव को आशुतोष भी कहा जाता है। आशु का अर्थ है “बड़ी जल्दी” तथा तोष का अर्थ है “प्रसन्न होना।” देवताओं को सलाह दी गई कि वे शिव के पास जाकर क्षमा माँगें और चूँकि शिव शीघ्र ही प्रसन्न हो जाने वाले हैं, अत: उनका काम अवश्य बन जाएगा। ब्रह्माजी शिव के मन की बात अच्छी तरह जानते थे और उन्हें विश्वास था कि उनके चरणकमलों के अपराधी देवता वहाँ जाकर बिना हिचक के आत्मसमर्पण करने पर अपने पापों से मुक्त हो सकेंगे।
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥