श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 6: ब्रह्मा द्वारा शिवजी को मनाना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक
नाहं न यज्ञो न च यूयमन्ये
ये देहभाजो मुनयश्च तत्त्वम् ।
विदु: प्रमाणं बलवीर्ययोर्वा
यस्यात्मतन्त्रस्य क उपायं विधित्सेत् ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; अहम्—मैं; न—न तो; यज्ञ:—इन्द्र; न—न तो; च—तथा; यूयम्—तुम सभी; अन्ये—दूसरे; ये—जो; देह-भाज:— देहधारी; मुनय:—मुनि; च—तथा; तत्त्वम्—सच्चाई; विदु:—जानते हैं; प्रमाणम्—विस्तार; बल-वीर्ययो:—बल तथा वीर्य; वा—अथवा; यस्य—शिव का; आत्म-तन्त्रस्य—आत्मनिर्भर शिव का; क:—क्या; उपायम्—साधन; विधित्सेत्—निकालना चाहेगा ।.
 
अनुवाद
 
 ब्रह्मा ने कहा कि न तो वे स्वयं, न इन्द्र, न यज्ञस्थल में समवेत समस्त सदस्य ही अथवा सभी मुनिगण ही जान सकते हैं कि शिव कितने शक्तिमान हैं। ऐसी अवस्था में ऐसा कौन होगा जो उनके चरणकमलों पर पाप करने का दुस्साहस करेगा?
 
तात्पर्य
 जब ब्रह्मा ने देवताओं को शिव के पास जाकर क्षमा माँगने की सलाह दे दी तो यह सुझाव दिया गया कि आखिर उनके सामने कैसे यह मामला रखा जाये जाय और कैसे उन्हें प्रसन्न किया जाये? ब्रह्मा ने यह भी बताया कि कोई भी बद्धजीव, यहाँ तक कि वे स्वयं तथा समस्त देवतागण भी शिव को प्रसन्न करने की विधि नहीं जानते। किन्तु उन्होंने कहा, “यह ज्ञात है कि वे तुरन्त प्रसन्न किए जा सकते हैं, अत: हमें चाहिए कि हम उनके चरणकमलों में गिरकर उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करें।”

वास्तव में अधीनस्थ को सदैव परमेश्वर की शरण में जाना चाहिए। यही भगवद्गीता की शिक्षा है। भगवान् प्रत्येक व्यक्ति को सभी प्रकार के आडम्बरयुक्त पदों को त्यागने और उनकी शरण में आने के लिए कहते हैं। इससे बद्धजीव समस्त पाप-बन्धनों से बच जाते हैं। इसी प्रकार, यहाँ पर ब्रह्मा ने सुझाव दिया कि वे शिवजी के पास जाकर उनके चरणकमलों की शरण ग्रहण करें, क्योंकि उनके अत्यन्त दयालु होने तथा सरलता से प्रसन्न होने के कारण काम बन जाएगा।

 
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