श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 7: दक्ष द्वारा यज्ञ सम्पन्न करना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक
तदा वृषध्वजद्वेषकलिलात्मा प्रजापति: ।
शिवावलोकादभवच्छरद्‌ध्रद इवामल: ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
तदा—उस समय; वृष-ध्वज—शिव, जो बैल पर सवार रहते हैं; द्वेष—ईर्ष्या; कलिल-आत्मा—दूषित हृदय; प्रजापति:—राजा दक्ष; शिव—शिव को; अवलोकात्—देखने से; अभवत्—हो गया; शरत्—शरद ऋतु में; ह्रद:—झील; इव—सदृश; अमल:—निर्मल, स्वच्छ ।.
 
अनुवाद
 
 उस समय जब दक्ष ने बैल पर सवारी करने वाले शिव को देखा तो उसका हृदय, जो शिव के प्रति द्वेष से कलुषित था, तुरन्त निर्मल हो गया, जिस प्रकार सरोवर का जल शरदकालीन वर्षा से स्वच्छ हो जाता है।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर उदाहरण दिया गया है कि शिवजी मंगलकारी क्यों कहलाते हैं। जो कोई शिव को भक्ति भाव से तथा आदरपूर्वक देखता है, उसका हृदय निर्मल हो जाता है। राजा दक्ष का हृदय शिव के प्रति द्वेष से दूषित था, अत: जब उसने थोड़े प्रेम तथा भक्ति के साथ शिव को देखा तो उसका हृदय तुरन्त स्वच्छ हो गया। वर्षा ऋतु में जलाशय गँदले हो जाते हैं, किन्तु जब शरदकाल में वर्षा होती है, तो सारा जल तुरन्त निर्मल तथा पारदर्शी हो जाता है। इसी प्रकार दक्ष का हृदय, यद्यपि शिवजी को अपमानित करने से अशुद्ध था, और जिसके कारण उसे दण्डित होना पड़ा था, किन्तु अब दक्ष को चेत हो चुका था, अत: शिव को श्रद्धापूर्वक देखते ही उसका हृदय तुरन्त स्वच्छ हो गया।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥