श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 7: दक्ष द्वारा यज्ञ सम्पन्न करना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक
मैत्रेय उवाच
क्षमाप्यैवं स मीढ्‍वांसं ब्रह्मणा चानुमन्त्रित: ।
कर्म सन्तानयामास सोपाध्यायर्त्विगादिभि: ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
मैत्रेय:—मैत्रेय मुनि ने; उवाच—कहा; क्षमा—क्षमा; आप्य—प्राप्त करके; एवम्—इस प्रकार; स:—राजा दक्ष; मीढ्वांसम्— शिव को; ब्रह्मणा—ब्रह्मा सहित; च—भी; अनुमन्त्रित:—अनुमति पाकर; कर्म—यज्ञ; सन्तानयाम् आस—पुन: प्रारम्भ किया; स—सहित; उपाध्याय—विद्वान साधु; ऋत्विक्—पुरोहित; आदिभि:—इत्यादि के द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 मैत्रेय मुनि ने कहा : इस प्रकार शिवजी द्वारा क्षमा कर दिये जाने पर राजा दक्ष ने ब्रह्मा की अनुमति से विद्वान साधुओं, पुरोहितों तथा अन्यों के साथ पुन: यज्ञ करना प्रारम्भ कर दिया।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥