श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 7: दक्ष द्वारा यज्ञ सम्पन्न करना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक
अप्यर्वाग्वृत्तयो यस्य महि त्वात्मभुवादय: ।
यथामति गृणन्ति स्म कृतानुग्रहविग्रहम् ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
अपि—अब भी; अर्वाक्-वृत्तय:—मानसिक क्रिया-कलापों से परे; यस्य—जिसकी; महि—यश; तु—लेकिन; आत्मभू- आदय:—ब्रह्मा इत्यादि ने.; यथा-मति—अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार; गृणन्ति स्म—स्तुति की; कृत-अनुग्रह—उनके अनुग्रह से प्रकट; विग्रहम्—दिव्य रूप ।.
 
अनुवाद
 
 यद्यपि ब्रह्मा जैसे देवता भी परमेश्वर की अनन्त महिमा का अनुमान लगाने में असमर्थ थे, किन्तु वे सभी भगवान् की कृपा से उनके दिव्य रूप को देख सकते थे। अत: वे अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार उनकी सादर स्तुति कर सके।
 
तात्पर्य
 भगवान् सदैव अनन्त हैं और उनकी महिमाओं का वर्णन कर पाना ब्रह्मा जैसे पुरुष के लिए भी दुष्कर है। कहा जाता है कि भगवान् के प्रत्यक्ष अवतार अनन्त के अनन्त मुख हैं और वे प्रत्येक मुख से अनन्त काल से भगवान् की महिमा-वर्णन का प्रयत्न करते रहे हैं, तो भी उनकी महिमाओं का वर्णन पूरा नहीं हो पाया। सामान्य मनुष्य के लिए भगवान् की अनन्त महिमा को समझ पाना या उसका वर्णन कर पाना सम्भव नहीं, किन्तु अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार लोग उनकी स्तुति तो कर ही सकते हैं। सेवा भाव से यह शक्ति बढ़ती है। सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ का अर्थ है कि जीभ से भगवान् की सेवा प्रारम्भ होती है। यह कीर्तन की द्योतक है, हरे कृष्ण कीर्तन से भगवान् की सेवा प्रारम्भ की जा सकती है। जीभ का दूसरा कार्य भगवान् के प्रसाद का स्वाद लेना और उसे ग्रहण करना है। हमें अनन्त की सेवा जीभ से प्रारम्भ करनी चाहिए और जप करने तथा भगवान् का प्रसाद ग्रहण करने में पटु होना चाहिए। भगवान् के प्रसाद को ग्रहण करने का अर्थ है समूची इन्द्रियों को वश में करना। जीभ सर्वाधिक अनियंत्रित इन्द्रिय मानी जाती है क्योंकि यह अनेक अभक्ष्य पदार्थों के पीछे पड़ी रहती है, जिससे यह जीवात्मा को बद्धजीवन के गर्त में धकेलती है। चूँकि जीवात्मा एक जीव से दूसरे में देहान्तर करता है, अत: उसे अत्यन्त घृणित वस्तुएँ खानी पड़ती हैं, जिसका कोई पारावार नहीं है। जीभ को जप करने तथा भगवान् के प्रसाद खाने में लगाना चाहिए जिससे अन्य इन्द्रियाँ वश में रहें। जप या कीर्तन ओषधि है, प्रसाद भोजन है। इन क्रियाओं से सेवा प्रारम्भ की जा सकती है और ज्यों-ज्यों सेवा बढ़ती जाती है, भगवान् भक्त के समक्ष अधिकाधिक रूप में प्रकट होते हैं। किन्तु उनकी महिमा का अन्त नहीं है और उनकी सेवा का भी अन्त नहीं है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥