श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 7: दक्ष द्वारा यज्ञ सम्पन्न करना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  4.7.34 
ऋषय ऊचु:
अनन्वितं ते भगवन् विचेष्टितं
यदात्मना चरसि हि कर्म नाज्यसे ।
विभूतये यत उपसेदुरीश्वरीं
न मन्यते स्वयमनुवर्ततीं भवान् ॥ ३४ ॥
 
शब्दार्थ
ऋषय:—ऋषियों ने; ऊचु:—प्रार्थना की; अनन्वितम्—आश्चर्यजनक; ते—तुम्हारा; भगवन्—हे समस्त ऐश्वर्यों के स्वामी; विचेष्टितम्—कार्यकलाप; यत्—जो; आत्मना—अपनी शक्तियों से; चरसि—करते हो; हि—निश्चय ही; कर्म—ऐसे कार्यों को; न अज्यसे—लिप्त नहीं होते; विभूतये—उसकी कृपा के हेतु; यत:—जिससे; उपसेदु:—पूज्य; ईश्वरीम्—ऐश्वर्य की देवी, लक्ष्मी; न मन्यते—लिप्त नहीं होती हैं; स्वयम्—स्वयं; अनुवर्ततीम्—अपनी आज्ञाकारी दासी (लक्ष्मी); भवान्—आप ।.
 
अनुवाद
 
 ऋषियों ने प्रार्थना की: हे भगवान्, आपके कार्य अत्यन्त आश्चर्यमय हैं और यद्यपि आप सब कुछ अपनी विभिन्न शक्तियों से करते हैं, किन्तु आप उनसे लिप्त नहीं होते। यहाँ तक कि आप सम्पत्ति की देवी लक्ष्मीजी से भी लिप्त नहीं हैं, जिनकी पूजा ब्रह्माजी जैसे बड़े-बड़े देवताओं द्वारा उनकी कृपा प्राप्त करने के उद्देश्य से की जाती है।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता में कहा गया कि भगवान् को अपने अद्भुत कर्मों के फल की कोई कामना नहीं रहती और न ही उन्हें कर्म करने की आवश्यकता ही है। किन्तु सामान्य जनों के समक्ष उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए वे कभी-कभी कर्म करते हैं, जो अत्यन्त आश्चर्यजनक होते हैं। न मां कर्माणि लिम्पन्ति—यद्यपि वे अत्यन्त आश्चर्यजनक ढंग से कर्म करते हैं, किन्तु वे किसी वस्तु से लिप्त नहीं होते (भगवद्गीता ४.१४)। वे स्वत:पूर्ण हैं। यहाँ पर उदाहरण दिया गया है कि सम्पत्ति की देवी लक्ष्मी सदैव भगवान् की सेवा में लगी रहती हैं, किन्तु तो भी वे उनसे लिप्त नहीं होते। यहाँ तक कि ब्रह्मा जैसे देवता भी सम्पत्ति की देवी लक्ष्मी का कृपापात्र बनने के लिए उनकी पूजा करते हैं; किन्तु, यद्यपि भगवान् की पूजा में सैकड़ों-हजारों सम्पत्ति की देवियाँ लगी रहती हैं, पर वे उनमें से किसी से लिप्त नहीं होते। भगवान् की इस उच्च दिव्य स्थिति का वर्णन अनेक ऋषियों ने विशेष तौर पर किया है। वे सामान्य जीवात्मा की भाँति नहीं हैं, जो पुण्य कर्मों के फल के प्रति आसक्त होता है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥