श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 7: दक्ष द्वारा यज्ञ सम्पन्न करना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक
सिद्धा ऊचु:
अयं त्वत्कथामृष्टपीयूषनद्यां
मनोवारण: क्लेशदावाग्निदग्ध: ।
तृषार्तोऽवगाढो न सस्मार दावं
न निष्क्रामति ब्रह्मसम्पन्नवन्न: ॥ ३५ ॥
 
शब्दार्थ
सिद्धा:—सिद्धों ने; ऊचु:—प्रार्थना की; अयम्—वह; त्वत्-कथा—आपकी लीलाएँ; मृष्ट—शुद्ध; पीयूष—अमृत की; नद्याम्—नदी में; मन:—मन का; वारण:—हाथी; क्लेश—कष्ट; दाव-अग्नि—जंगल की आग से; दग्ध:—जला हुआ; तृषा— प्यास; आर्त:—त्रस्त; अवगाढ:—निमज्जित; न सस्मार—स्मरण नहीं करते; दावम्—दावाग्नि या कष्टों को; न निष्क्रामति— बाहर नहीं आता; ब्रह्म—परम; सम्पन्न-वत्—मानो तदाकार हों; न:—हम ।.
 
अनुवाद
 
 सिद्धों ने स्तुति की : हे भगवन्, हमारे मन उस हाथी के समान हैं, जो जंगल की आग से त्रस्त होने पर नदी में प्रविष्ट हो ते ही सभी कष्ट भूल सकता है। उसी तरह ये हमारे मन भी आपकी दिव्य लीलाओं की अमृत-नदी में निमज्जित हैं और ऐसे दिव्य आनन्द में निरन्तर बने रहना चाहते हैं, जो परब्रह्म में तदाकार होने के सुख के समान ही है।
 
तात्पर्य
 यह कथन सिद्धलोक के वासियों का है, जहाँ आठ प्रकार की भौतिक सिद्धियाँ पाई जाती हैं। वहाँ के वासी आठ प्रकार की योग सिद्धियों के स्वामी होते हैं, किन्तु उनके कथन से ऐसा लगता है कि वे शुद्ध भक्त हैं। वे भगवान् की लीलाओं के श्रवण की अमृत-सरिता में निरन्तर अवगाहन करते हैं। भगवान् की लीलाओं का श्रवण कृष्ण-कथा कहलाता है। इसी प्रकार प्रह्लाद महाराज का कथन है कि जो लोग भगवान् की लीलाओं की कथा-वर्णन के अमृत-सागर में डूबे रहते हैं, वे मुक्त हैं और उन्हें भौतिक जीवन से कोई भय नहीं रहता। सिद्धों का कहना है कि सामान्य पुरुष का मन चिन्ताओं से पूर्ण रहता है। यहाँ पर एक ऐसे हाथी का उदाहरण दिया गया है, जो जंगल की आग से त्रस्त होकर राहत पाने के लिए नदी में घुस जाता है। यदि इस संसार रूपी दावाग्नि से पीडि़त लोग भगवान् की लीलाओं की कथा के वर्णन रूपी अमृत-सरोवर में केवल प्रविष्ट हो जाँए तो वे इस संसार के सारे कष्ट भूल जायें। सिद्धों को सकाम कर्मों की—यथा यज्ञ करके अच्छे फल भोगने की— तनिक भी परवाह नहीं रहती। वे तो मात्र भगवान् की लीलाओं की दिव्य चर्चा में मग्न रहते हैं, इसीसे वे परम प्रसन्न रहते हैं, उन्हें शुभ या अशुभ कर्मों के करने की परवाह नहीं रहती। जो लोग सदैव कृष्णभावनाभावित रहते हैं, उन्हें किसी प्रकार के कर्म या यज्ञ करने की आवश्यकता नहीं रह जाती। कृष्णभावनामृत स्वयं में पूर्ण है, क्योंकि इसमें वेदवर्णित सभी विधियाँ सम्मिलित हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥