श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 7: दक्ष द्वारा यज्ञ सम्पन्न करना  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक
यजमान्युवाच
स्वागतं ते प्रसीदेश तुभ्यं नम:
श्रीनिवास श्रिया कान्तया त्राहि न: ।
त्वामृतेऽधीश नाङ्गैर्मख: शोभते
शीर्षहीन: कबन्धो यथा पुरुष: ॥ ३६ ॥
 
शब्दार्थ
यजमानी—दक्ष की पत्नी ने; उवाच—प्रार्थना की; सु-आगतम्—शुभ आगमन; ते—आपका; प्रसीद—प्रसन्न हों; ईश—मेरे भगवान्; तुभ्यम्—तुमको; नम:—नमस्कार है; श्रीनिवास—हे सम्पत्ति की देवी के धाम; श्रिया—लक्ष्मी समेत; कान्तया— अपनी पत्नी; त्राहि—रक्षा करें; न:—हमारी; त्वाम्—तुम्हारे; ऋते—बिना; अधीश—हे परम नियंता; न—नहीं; अङ्गै:— शारिरिक अंगों से; मख:—यज्ञ स्थल; शोभते—शोभा पाता है; शीर्ष-हीन:—शिर रहित; क-बन्ध:—धड़; यथा—जिस प्रकार; पुरुष:—पुरुष ।.
 
अनुवाद
 
 दक्ष की पत्नी ने इस प्रकार प्रार्थना की—हे भगवान्, यह हमारा सौभाग्य है कि आप यज्ञस्थल में पधारे हैं। मैं आपको सादर नमस्कार करती हूँ और आपसे प्रार्थना करती हूँ कि इस अवसर पर आप प्रसन्न हों। यह यज्ञस्थल आपके बिना शोभा नहीं पा रहा था, जिस प्रकार कि सिर के बिना धड़ शोभा नहीं पाता।
 
तात्पर्य
 भगवान् विष्णु का अन्य नाम यज्ञेश्वर है। भगवद्गीता में कहा गया है कि सभी कर्म विष्णु की प्रसन्नता के लिए विष्णु-यज्ञ के रूप में सम्पन्न किए जाँए। जब तक हम उन्हें प्रसन्न नहीं करते, हम जो कुछ भी करते हैं, वह हमारे भव-बन्धन का कारण हो जाता है। यहाँ पर इसकी पुष्टि दक्ष की पत्नी ने की है, “आपकी उपस्थिति के बिना, इस यज्ञ-महोत्सव का सारा ठाठ-बाट व्यर्थ है, जिस प्रकार सिरविहीन शरीर को कितना ही क्यों न सजाएँ, वह बेकार लगता है।” यह उपमा सामाजिक शरीर पर भी पूर्ण रूप से लागू होती है। आधुनिक सभ्यता को उन्नत होने का गर्व है, किन्तु यह सिरविहीन धड़ के सदृश बेकार है। कृष्णभावनाभावित हुए बिना, विष्णु को जाने बिना, सभ्यता कितनी ही उत्कृष्ट प्रगति क्यों न कर ले, किसी काम की नहीं। हरि-भक्ति-सुधोदय में (३.११) एक कथन है—

भगवद्भक्तिहीनस्य जाति: शास्त्रं जपस्तप:।

अप्राणस्यैव देहस्य मण्डनं लोकरञ्जनम् ॥

इसका सारांश यह है कि जब विशेष रूप से छोटी जाति में कोई मित्र या परिजन मरता है, तो उसके मृत शरीर को सजाया जाता है। इस प्रकार वस्त्र तथा अलंकारों से सजा कर शवयात्रा निकाली जाती है। इस प्रकार से शव के अलंकरण का वास्तव में कोई अर्थ नहीं होता, क्योंकि आत्मा तो पहले ही निकल चुकी होती है। इसी प्रकार से कृष्णभावनामृत के बिना कोई राज्यतंत्र, कोई सामाजिक प्रतिष्ठा, या भौतिक सभ्यता की प्रगति अलंकृत शव के समान है। दक्ष की पत्नी का नाम प्रसूति था और वह स्वायंभुव मनु की पुत्री थी। उसकी बहन देवहूति कर्दम मुनि को ब्याही थी और वे भगवान् कपिल देव की माता थी। इस प्रकार प्रसूति भगवान् विष्णु की मौसी थी। वह भगवान् विष्णु से वत्सलतावश कृपाकामना कर रही थी; चूँकि वे उसकी मौसी थीं इसलिए उनसे विशेष कृपा चाह रही थीं। इस श्लोक की यह भी विशेषता है कि इसमें विष्णु की प्रशंसा लक्ष्मी के साथ-साथ की गई है। जहाँ भी विष्णु की पूजा की जाती है, वहाँ स्वाभाविक रूप से लक्ष्मी जी की कृपा रहती है। भगवान् विष्णु को अमृत अथवा दिव्य कहा गया है। ब्रह्मा तथा शिव समेत सभी देवता सृष्टि के बाद उत्पन्न हुए, किन्तु विष्णु तो सृष्टि के पूर्व भी विद्यमान थे। अत: उन्हें अमृत कहा गया है। वैष्णवजन विष्णु को उनकी अन्तरंगा शक्ति सहित पूजते हैं। दक्ष-पत्नी प्रसूति ने भगवान् से प्रार्थना की कि वे पुरोहितों को वैष्णव बना दें जिससे वे सकाम फल के लिए मात्र यज्ञकर्ता न बने रहें।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥