श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 7: दक्ष द्वारा यज्ञ सम्पन्न करना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक
पूषा तु यजमानस्य दद्‌भिर्जक्षतु पिष्टभुक् ।
देवा: प्रकृतसर्वाङ्गा ये म उच्छेषणं ददु: ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
पूषा—पूषा; तु—लेकिन; यजमानस्य—यज्ञकर्ता का; दद्भि:—दाँतों से; जक्षतु—चबाए; पिष्ट-भुक्—आटे का भोजन; देवा:—देवता; प्रकृत—निर्मित; सर्व-अङ्गा:—पूर्ण; ये—जो; मे—मुझको; उच्छेषणम्—यज्ञ भाग; ददु:—दिया ।.
 
अनुवाद
 
 पूषादेव अपने शिष्यों के दाँतों से चबायेंगे और यदि अकेले चाहें तो उन्हें सत्तू की बनी लोई खाकर सन्तुष्ट होना पड़ेगा। किन्तु जिन देवताओं ने मेरा यज्ञ-भाग देना स्वीकार कर लिया है वे सभी प्रकार की चोटों से स्वस्थ हो जाएँगे।
 
तात्पर्य
 पूषादेव को चबाने के लिए अपने शिष्य पर निर्भर होना पड़ा, अन्यथा उसे चने के आटे की लोई खाने को मिलती। इस प्रकार उसका दण्ड चालू रहा। वह खाने के लिए अपने दाँतों का उपयोग नहीं कर सका, क्योंकि वह शिवजी पर हँसा था और उसने दाँत दिखा कर उनका मजाक उड़ाया था। दूसरे शब्दों में, शिव के विरुद्ध दाँतों का प्रयोग करने के कारण उसके दाँत न रहने देना ही श्रेयस्कर था।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥