श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 7: दक्ष द्वारा यज्ञ सम्पन्न करना  »  श्लोक 42

 
श्लोक
देवा ऊचु:
पुरा कल्पापाये स्वकृतमुदरीकृत्य विकृतं
त्वमेवाद्यस्तस्मिन् सलिल उरगेन्द्राधिशयने ।
पुमान्शेषे सिद्धैर्हृदि विमृशिताध्यात्मपदवि:
स एवाद्याक्ष्णोर्य: पथि चरसि भृत्यानवसि न: ॥ ४२ ॥
 
शब्दार्थ
देवा:—देवताओं ने; ऊचु:—कहा; पुरा—पहले, पूर्व; कल्प-अपाये—कल्पान्त में; स्व-कृतम्—आत्म-प्रसूत; उदरी-कृत्य— उदरस्थ करके; विकृतम्—प्रभाव; त्वम्—तुम; एव—निश्चय ही; आद्य:—आदि; तस्मिन्—उसमें; सलिले—जल में; उरग- इन्द्र—शेष पर; अधिशयने—शय्या पर; पुमान्—पुरुष; शेषे—शयन करते हुए; सिद्धै:—मुक्तात्माओं (यथा सनकादि) द्वारा.); हृदि—हृदय में; विमृशित—ध्यान किया गया; अध्यात्म-पदवि:—दार्शनिक चिन्तन का मार्ग; स:—वह; एव—निश्चय ही; अद्य—अब; अक्ष्णो:—दोनों नेत्रों का; य:—जो; पथि—पथ पर; चरसि—चलते हो; भृत्यान्—दास; अवसि—रक्षा करो; न:—हमारी ।.
 
अनुवाद
 
 देवताओं ने कहा : हे भगवान्, पहले जब प्रलय हुआ था, तो आपने भौतिक जगत की विभिन्न शक्तियों को संरक्षित कर लिया था। उस समय ऊर्ध्वलोकों के सभी वासी, जिनमें सनक जैसे मुक्त जीव भी थे, दार्शनिक चिन्तन द्वारा आपका ध्यान कर रहे थे। अत: आप आदिपुरुष हैं। आप प्रलयकालीन जल में शेषशय्या पर शयन करते हैं। अब आज आप हमारे के समक्ष दिख रहे हैं। हम सभी आप के दास हैं। कृपया हमें शरण दीजिये।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में जिस आंशिक प्रलय का उल्लेख है, वह इस ब्रह्माण्ड के ही अन्तर्गत निम्न लोकों का आंशिक प्रलय है जब ब्रह्मा निद्रा में रहते हैं। इस प्रलय के समय उच्चतर लोक, जो महर्लोक, जनलोक और तपोलोक इत्यादि हैं, जलमग्न नहीं होते। जैसा इस श्लोक में कहा गया है, भगवान् ही स्रष्टा हैं, क्योंकि सृष्टि की शक्तियाँ उनके शरीर से प्रकट होती हैं और प्रलय के बाद वे इन समस्त शक्तियों को उदरस्थ कर लेते हैं।
इस श्लोक में दूसरा महत्त्वपूर्ण बिन्दु है, जो देवताओं ने कहा, वह यह है “हम सभी आपके दास (भृत्यान्) हैं। हमें संरक्षण दीजिए।” देवता अपनी रक्षा के लिए विष्णु पर आश्रित रहते हैं, क्योंकि वे स्वतत्र नहीं हैं। अत: भगवद्गीता देवताओं की पूजा की भर्त्सना करती है, क्योंकि इसकी कोई आवश्यकता नहीं है और साफ-साफ कहा गया है कि जिनकी मति मारी गई है वे ही देवताओं से अनुग्रह की कामना करते हैं। सामान्य रूप से यदि किसी की कोई भौतिक इच्छा है, तो उसकी पूर्ति के लिए वह अन्य देवताओं के पास न जाकर विष्णु से याचना कर सकता है। जो देवताओं को पूजते हैं, वे अधिक बुद्धिमान नहीं हैं। इसके साथ-साथ देवता कह रहे हैं, “हम आपके नित्य दास हैं।” अत: जो भगवान् के दास या भक्त हैं, वे सकाम कर्मों से, यथा यज्ञ या मानसिक चिन्तन से, अधिक वास्ता नहीं रखते। वे सहजभाव से निष्ठापूर्वक भगवान् की सेवा करते हैं और हर कार्य अत्यन्त प्रेम तथा श्रद्धा से करते हैं, अत: भगवान् ऐसे भक्तों की प्रत्यक्ष संरक्षण प्रदान करते हैं। भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं, “मेरी शरण में आओ और मैं समस्त पापकर्मों के बन्धनों से तुम्हारी रक्षा करूँगा।” इस भौतिक जगत की सृष्टि ही ऐसे हुई है कि हर एक को जाने या अनजाने पापकर्म करने होते हैं और जब तक वह विष्णु को अपना जीवन समर्पित नहीं कर देता, उसे समस्त पापकर्मों के फल सहने पड़ते हैं। किन्तु जो भगवान् को आत्मसमर्पण करके अपना जीवन उनकी सेवा में लगा देता है उसकी वे प्रत्यक्ष रक्षा करते हैं। उसे न तो पापकर्मों के फल का डर रह जाता है, नही जाने अथवा अनजाने किसी ऐसे कर्म को, करने की इच्छा होती है, जो पापमय हो।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥