श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 7: दक्ष द्वारा यज्ञ सम्पन्न करना  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक
त्वं पुरा गां रसाया महासूकरो
दंष्ट्रया पद्मिनीं वारणेन्द्रो यथा ।
स्तूयमानो नदल्लीलया योगिभि-
र्व्युज्जहर्थ त्रयीगात्र यज्ञक्रतु: ॥ ४६ ॥
 
शब्दार्थ
त्वम्—तुम; पुरा—भूतकाल में; गाम्—पृथ्वी; रसाया:—जल के भीतर से; महा-सूकर:—महान् शूकर अवतार; दंष्ट्रया— अपनी दाढ़ से; पद्मिनीम्—कमलिनी; वारण-इन्द्र:—हाथी; यथा—जिस प्रकार; स्तूयमान:—स्तुति किया गया; नदन्—गूँजता हुआ; लीलया—सरलता से; योगिभि:—सनक इत्यादि परम साधुओं द्वारा.; व्युज्जहर्थ—ऊपर उठाया; त्रयी-गात्र—हे साक्षात् वैदिक ज्ञान; यज्ञ-क्रतु:—यज्ञ के रूप में ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवान्, हे साक्षात् वैदिक ज्ञान, अत्यन्त पुरातन काल पहले, पिछले युग में जब आप महान् सूकर अवतार के रूप में प्रकट हुए थे तो आपने पृथ्वी को जल के भीतर से इस प्रकार ऊपर उठा लिया था जिस प्रकार कोई हाथी सरोवर में से कमलिनी को उठा लाता है। जब आपने उस विराट सूकर रूप में दिव्य गर्जन किया, तो उस ध्वनि को यज्ञ मंत्र के रूप में स्वीकार कर लिया गया और सनक जैसे महान् ऋषियों ने उसका ध्यान करते हुए आपकी स्तुति की।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में एक महत्त्वपूर्ण शब्द त्रयीगात्र आया है, जिसका अर्थ है कि भगवान् का दिव्य रूप वेद हैं। जो कोई भगवान् के अर्चाविग्रह या रूप की पूजा मन्दिर में करता है, तो यह समझा जाता है कि वह चौबीसों घंटे वेदों का पाठ करता है। यदि कोई मन्दिर में भगवान् अर्थात् राधा तथा कृष्ण की मूर्तियों को अलंकृत करता है, तो वह अत्यन्त सूक्ष्मता के साथ वैदिक आदेशों का अध्ययन करता होता है। यहाँ तक कि नवदीक्षित भक्त भी, जो अर्चा-विग्रह की पूजा में अपने को लगाता है, वैदिक ज्ञान के सारभाग के सम्पर्क में रहता समझा जाता है। जैसाकि भगवद्गीता (१५.१५) में पुष्टि हुई है—वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्य:—वेदों का तात्पर्य कृष्ण को समझना है। जो कृष्ण की पूजा तथा सेवा करता है, वह वेदों के सत्य को जानता है।
 
शेयर करें
       
 
  All glories to Srila Prabhupada. All glories to वैष्णव भक्त-वृंद
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
About Us | Terms & Conditions
Privacy Policy | Refund Policy
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥