श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 7: दक्ष द्वारा यज्ञ सम्पन्न करना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक
स प्रसीद त्वमस्माकमाकाङ्‌क्षतां
दर्शनं ते परिभ्रष्टसत्कर्मणाम् ।
कीर्त्यमाने नृभिर्नाम्नि यज्ञेश ते
यज्ञविघ्ना: क्षयं यान्ति तस्मै नम: ॥ ४७ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वही व्यक्ति; प्रसीद—प्रसन्न हों; त्वम्—आप; अस्माकम्—हम पर; आकाङ्क्षताम्—प्रतीक्षा करते हुए; दर्शनम्—दर्शन; ते—तुम्हारा; परिभ्रष्ट—पतित; सत्-कर्मणाम्—जिससे यज्ञ कार्य; कीर्त्यमाने—कीर्तन किया जाकर; नृभि:—पुरुषों द्वारा; नाम्नि—आपका पवित्र नाम; यज्ञ-ईश—हे यज्ञों के स्वामी; ते—तुम्हारा; यज्ञ-विघ्ना:—बाधाएँ; क्षयम्—विनाश; यान्ति— प्राप्त करते हैं; तस्मै—तुमको; नम:—नमस्कार है ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवान्, हम आपके दर्शन के लिए प्रतीक्षारत थे क्योंकि हम वैदिक अनुष्ठानों के अनुसार यज्ञ करने में असमर्थ रहे हैं। अत: हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि आप हम पर प्रसन्न हों। आपके पवित्र नाम-कीर्तन मात्र से समस्त बाधाएँ दूर हो जाती हैं। हम आपके समक्ष आपको सादर नमस्कार करते हैं।
 
तात्पर्य
 ब्राह्मण पुरोहित अत्यन्त आशान्वित हुए कि भगवान् विष्णु के आ जाने से अब उनका यज्ञ निर्विघ्न समाप्त हो सकेगा। इस श्लोक में ब्राह्मणों का यह कथन सारगर्भित हैं, “आपके पवित्र नाम का जप करके ही हम बाधाओं को पार कर सकते हैं, किन्तु आप इस समय साक्षात् उपस्थित हैं।” दक्ष का यज्ञ शिव के अनुचरों तथा शिष्यों द्वारा बाधित कर दिया गया था। एक तरह से ब्राह्मणों ने शिव के अनुचरों की आलोचना की, किन्तु चूँकि ब्राह्मण भगवान् विष्णु द्वारा सदा रक्षित हैं, अत: शिव के अनुचर उनके यज्ञ में किसी प्रकार की बाधा उपस्थित नहीं कर सकते थे। कहावत है, “जाको राखै साइयाँ मारि सकै नहिं कोय” और जब कृष्ण किसी को मारना चाहते हैं, तो उसको कोई बचा भी नहीं सकता। इसका ज्वलन्त प्रमाण रावण है। रावण शिव का महान् भक्त था, किन्तु जब भगवान् रामचन्द्र ने उसे मारना चाहा तो शिव उसकी रक्षा नहीं कर पाये। यदि कोई देवता, चाहे वह शिव या ब्रह्मा ही क्यों न हों, किसी भक्त को हानि पहुँचाना चाहता है, तो कृष्ण उसकी रक्षा करते हैं। किन्तु यदि कृष्ण किसी को मारना चाहते हैं, जैसे कि रावण या हिरण्यकशिपु को, तो कोई भी देवता उसकी रक्षा नहीं कर पाता।
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥