श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 7: दक्ष द्वारा यज्ञ सम्पन्न करना  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक
आत्ममायां समाविश्य सोऽहं गुणमयीं द्विज ।
सृजन् रक्षन् हरन् विश्वं दध्रे संज्ञां क्रियोचिताम् ॥ ५१ ॥
 
शब्दार्थ
आत्म-मायाम्—अपनी शक्ति में; समाविश्य—प्रवेश करके; स:—स्वयं; अहम्—मैं; गुण-मयीम्—प्राकृतिक गुणों से युक्त; द्वि-ज—हे द्विजन्मा दक्ष; सृजन्—सृष्टि करते हुए; रक्षन्—पालन करते हुए; हरन्—संहार करते हुए; विश्वम्—दृश्य जगत; दध्रे—मैं उत्पन्न होता हूँ; संज्ञाम्—नाम; क्रिया-उचिताम्—क्रिया के अनुसार ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् ने कहा : हे दक्ष द्विज, मैं आदि भगवान् हूँ, किन्तु इस दृश्य जगत की सृष्टि, पालन तथा संहार के लिए मैं अपनी भौतिक शक्ति के माध्यम से कार्य करता हूँ और कार्य की भिन्न कोटियों के अनुसार मेरे भिन्न-भिन्न नाम हैं।
 
तात्पर्य
 जैसाकि भगवद्गीता (७.५) में बतलाया गया है—जीवभूतां महाबाहो—यह सारा विश्व भगवान् से निकली हुई शक्ति है और वे परा तथा अपरा शक्तियों के रूप में कार्य करते हैं। परा शक्ति जीवात्मा है, जो परमेश्वर का भिन्न अंश है। अंश होने के नाते जीवात्माएँ परमेश्वर से भिन्न नहीं हैं; उनसे निकली हुई शक्ति उनसे भिन्न नहीं है। किन्तु इस भौतिक जगत में वास्तविक क्रियाकलाप में प्रकृति के विभिन्न गुणों वाली तथा विभिन्न रूपों की शक्तियाँ जीवात्मा को प्रभावित करती हैं। कुल चौरासी लाख योनियाँ हैं। वही जीवात्मा प्रकृति के विभिन्न गुणों के अन्तर्गत कार्य करता है। इन जीवात्माओं के भिन्न-भिन्न शरीर होते हैं, किन्तु सृष्टि के आदि काल में भगवान् विष्णु अकेले थे। सृष्टि करने के उद्देश्य से ब्रह्मा प्रकट हुए और संहार करने के लिए शिव। जहाँ तक इस संसार में आध्यात्मिक प्रवेश करने की बात है, सभी जीव परमेश्वर के विभिन्न अंश हैं, किन्तु विभिन्न भौतिक गुणों के आवरण में उनके नाम भिन्न-भिन्न पड़ गये हैं। ब्रह्मा तथा शिव विष्णु के गुण-अवतार हैं और उनसे मिलकर विष्णु सतो गुण का भार सँभालते हैं, अत: विष्णु भी शिव तथा ब्रह्मा के समान गुण-अवतार हैं। वस्तुत: विभिन्न नाम विभिन्न आदेशों के लिए है, अन्यथा उनका मूल तो एक ही है।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥