श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 7: दक्ष द्वारा यज्ञ सम्पन्न करना  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक
यथा पुमान्न स्वाङ्गेषु शिर:पाण्यादिषु क्‍वचित् ।
पारक्यबुद्धिं कुरुते एवं भूतेषु मत्पर: ॥ ५३ ॥
 
शब्दार्थ
यथा—जिस प्रकार; पुमान्—पुरुष; न—नहीं; स्व-अङ्गेषु—अपने ही शरीर में; शिर:-पाणि-आदिषु—सिर, हाथ तथा शरीर के अन्य भागों में; क्वचित्—कभी-कभी; पारक्य-बुद्धिम्—अन्तर; कुरुते—करते हैं; एवम्—इस प्रकार; भूतेषु—जीवात्माओं में; मत्-पर:—मेरा भक्त ।.
 
अनुवाद
 
 सामान्य बुद्धि वाला व्यक्ति सिर तथा शरीर के अन्य भागों को पृथक्-पृथक् नहीं मानता। इसी प्रकार मेरे भक्त सर्वव्यापी भगवान् विष्णु तथा किसी वस्तु या किसी जीवात्मा में अन्तर नहीं मानते।
 
तात्पर्य
 जब शरीर का कोई भाग रुग्ण होता है, तो पूरा शरीर उस भाग की रखवाली करता है। इसी प्रकार भक्त द्वारा समस्त बद्धजीवों पर दया करना भक्त की एकात्मकता प्रकट करता है। भगवद्गीता (५.१८) कहती है—पण्डिता: समदर्शिन: अर्थात् जो विद्वान् हैं, वे प्रत्येक बद्धजीव को समभाव से देखते हैं। भक्त प्रत्येक बद्धजीव पर दया करने वाले हैं, अत: उन्हें अपारक्य-बुद्धि कहते हैं। चूँकि भक्तगण विद्वान् होते हैं और जानते हैं कि जीवात्मा परमेश्वर का भिन्न अंश है, अत: वे प्रत्येक व्यक्ति को कृष्णभक्ति का पाठ पढ़ाते हैं जिससे वे सुखी रह सकें। यदि शरीर का कोई भाग रुग्ण होता है, तो शरीर का सारा ध्यान उसी ओर लगा रहता है। इसी प्रकार से भक्तगण किसी भी ऐसे व्यक्ति का, जो कृष्ण को भूल बैठा है और फलस्वरूप भौतिक चेतना में खोया है, ध्यान रखते हैं। भक्त की समान-दृष्टि इसी में है कि वह समस्त जीवात्माओं को भगवान् के धाम जाने में सहायता पहुँचाता है।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥