श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 7: दक्ष द्वारा यज्ञ सम्पन्न करना  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक
तस्मा अप्यनुभावेन स्वेनैवावाप्तराधसे ।
धर्म एव मतिं दत्त्वा त्रिदशास्ते दिवं ययु: ॥ ५७ ॥
 
शब्दार्थ
तस्मै—उस (दक्ष) को; अपि—ही; अनुभावेन—परमेश्वर की पूजा द्वारा; स्वेन—अपने से; एव—निश्चय ही; अवाप्त-राधसे— सिद्धि प्राप्त करके; धर्मे—धर्म में; एव—निश्चय ही; मतिम्—बुद्धि; दत्त्वा—देकर; त्रिदशा:—देवता; ते—वे; दिवम्— स्वर्गलोक को; ययु:—चले गये ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार यज्ञ के अनुष्ठान द्वारा विष्णु की पूजा करके दक्ष पूर्ण रूप से धार्मिक पथ पर स्थित हो गया। इसके साथ ही, यज्ञ में समागत समस्त देवताओं ने उसे आशीर्वाद दिया कि ‘धर्मनिष्ठ हो’ और तब वे चले गये।
 
तात्पर्य
 यद्यपि दक्ष धर्म में काफी बढ़ा-चढ़ा था, किन्तु उसे देवताओं के आशीर्वाद की प्रतीक्षा थी। इस प्रकार दक्ष द्वारा चलाया गया यज्ञ शान्ति तथा सौहार्दपूर्वक पूर्ण हुआ।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥