श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 7: दक्ष द्वारा यज्ञ सम्पन्न करना  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक
तमेव दयितं भूय आवृङ्क्ते पतिमम्बिका ।
अनन्यभावैकगतिं शक्ति: सुप्तेव पूरुषम् ॥ ५९ ॥
 
शब्दार्थ
तम्—उस (शिव) को; एव—निश्चय ही; दयितम्—प्रिया; भूय:—पुन:; आवृङ्क्ते—स्वीकार किया; पतिम्—पति रूप में; अम्बिका—अम्बिका या सती; अनन्य-भावा—अन्यों से अलिप्त; एक-गतिम्—एक लक्ष्य; शक्ति:—(तटस्था तथा बाह्य), स्त्री शक्तियाँ; सुप्ता—निष्क्रिय; इव—सदृश; पूरुषम्—पुरुष (परमेश्वर के प्रतिनिधि के रूप में शिव) ।.
 
अनुवाद
 
 अम्बिका (देवी दुर्गा) ने, जो दाक्षायणी (सती) कहलाती थीं, पुन: शिव को अपने पति के रूप में स्वीकार किया, जिस प्रकार कि भगवान् की विभिन्न शक्तियाँ नवीन सृष्टि के समय कार्य करती हैं।
 
तात्पर्य
 परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते—इस वैदिक मंत्र के अनुसार भगवान् की अनेक शक्तियाँ होती हैं। शक्ति स्त्री है और भगवान् पुरुष हैं। स्त्री का धर्म है कि वह पुरुष के अधीन सेवा करे। जैसाकि भगवद्गीता में कहा गया है—सभी जीवात्माएँ भगवान् की तटस्था शक्तियाँ हैं। अत: समस्त जीवात्माओं का कर्तव्य है कि वे इस परम पुरुष की सेवा करें। इस भौतिक जगत में दुर्गा तटस्था तथा बहिरंगा दोनों ही शक्तियों की प्रतीक हैं और शिव परम पुरुष के प्रतीक हैं। शिव तथा अम्बिका या दुर्गा का सम्बन्ध शाश्वत है। सती शिव के अतिरिक्त अन्य को पति स्वीकार नहीं कर सकती थी। आगे जिस प्रकार शिव ने दुर्गा या हिमालय की कन्या हिमवती के साथ विवाह किया और कार्तिकेय का जन्म हुआ, वह अपने आप में एक लम्बी कथा है।
 
शेयर करें
       
 
  All glories to Srila Prabhupada. All glories to वैष्णव भक्त-वृंद
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
About Us | Terms & Conditions
Privacy Policy | Refund Policy
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥